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20210606
भारतीय व्रत, पर्व और उत्सव : पर्यावरणीय और मूल्य चेतना के परिप्रेक्ष्य में - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा | Indian Fasts and Festivals: Perspective of Environmental and Value Consciousness - Prof. Shailendrakumar Sharma
हिंदी नाटक, निबन्ध तथा स्फुट गद्य विधाएँ एवं मालवी भाषा साहित्य : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा | Hindi Drama, Essay and Other Prose genres and Malvi language - literature : Prof. Shailendra Kumar Sharma
हिंदी नाटक, निबन्ध तथा स्फुट गद्य विधाएँ एवं मालवी भाषा साहित्य : सम्पादक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा | Shailendrakumar Sharma
सुधी प्राध्यापकों के सहकार से मेरे द्वारा संपादित - प्रणीत ग्रंथ 'हिन्दी नाटक, निबंध तथा स्फुट गद्य रचनाएँ एवं मालवी भाषा-साहित्य' म प्र हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल से प्रकाशित हुआ है। हिंदी के प्रतिनिधि एकांकी, निबन्ध और अन्य गद्य विधाओं का समावेश किया गया। पुस्तक में विविध विधाओं और उनके प्रमुख लेखकों का परिचय दिया गया है। ग्रंथ में देश के हृदय मालवा की मर्म मधुर मालवी-निमाड़ी भाषा के साहित्य का अद्यतन इतिहास समाहित है। पुस्तक म प्र के भोपाल, इंदौर और उज्जैन स्थित विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर पर निर्धारित रही है।
इसी पुस्तक की भूमिका से..
मानव सभ्यता से जुड़ा कोई भी उपादान इतिहास से निरपेक्ष नहीं है। इस दृष्टि से भाषा और साहित्य का भी अपना इतिहास होता है। मूलतः साहित्य की सत्ता एक और अखंड सत्ता है। फिर भी अध्ययन सुविधा की दृष्टि से साहित्येतिहास को लेकर पर्याप्त मंथन होता आ रहा है। किसी भी क्षेत्र के साहित्य का लोकमानस और जीवन से घनिष्ठ संबंध होता है। जहाँ बिना सामाजिक संदर्भ के साहित्येतिहास लेखन संभव नहीं है, वही रचनाकार की सर्जनात्मक अनुभूतियों की उपेक्षा भी उचित नहीं कहीं जा सकती है। पुस्तक में मालवी-निमाड़ी भाषा और साहित्य के इतिहास-लेखन में इन बातों को विशेषतः दृष्टिपथ में रखा गया है। साथ ही साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा के साथ वातावरण के अंतःसंबंधों का भी समावेश किया गया है। साहित्येतिहास लेखन में कई नवीन तथ्यों और सामग्री का समावेश करने की दिशा में अनेक विद्वज्जनों, साहित्यानुरागियों और ग्रंथागारों का सहयोग मिला है।
साहित्येतिहास लेखन एक अविराम प्रक्रिया है। इस पुस्तक में संचित मालवी साहित्य के इतिहास को उसी प्रक्रिया में एक विनम्र प्रयास कहा जा सकता है। लोकभाषा में रचित साहित्य के इतिहास लेखन की दिशा में हाल ही में गति आई है। ऐसे प्रयासों से बोली में रचे साहित्य पर पुनर्विचार और प्रसार की संभावनाएँ भी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो रही है। पिछले दशक में मध्यप्रदेश के हृदय अंचल मालवा की मर्म मधुर मालवी-निमाड़ी और उसके साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की भूमिका बनी है।
प्रस्तुत पुस्तक में संचित मालवी से संबंधित सामग्री के लिए मालवा के प्रमुख मनीषियों-वरिष्ठ कवि डाॅ. शिव चौरसिया, डाॅ. भगवतीलाल राजपुरोहित (निदेशक,विक्रमादित्य शोध पीठ, उज्जैन), डाॅ. पूरन सहगल (मनासा), डाॅ. जगदीशचंद्र शर्मा ( विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन), मालवीमना साहित्यकार स्व. श्री झलक निगम एवं अर्धांगिनी प्रो. राजश्री शर्मा ने सत्परामर्श, युवा कवि डाॅ. राजेश रावल सुशील ने स्मरणीय सहकार दिया है, एतदर्थ आभार।
प्रस्तुत पुस्तक में साहित्यरसिक और अध्येता हिंदी के साथ मालवी और निमाड़ी साहित्य की प्रतिनिधि रचनाओं की झलक पा सकेंगे।
पुस्तक का नाम : हिन्दी नाटक, निबंध तथा स्फुट गद्य रचनाएँ एवं मालवी भाषा-साहित्य
प्रकाशक : म प्र हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल
मूल्य : 100 ₹
पृष्ठ : 440
20210602
लोकमाता अहिल्याबाई होलकर : राष्ट्रीय और सांस्कृतिक योगदान - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा | Lokmata Ahilyabai Holkar: National and Cultural Contribution - Prof. Shailendrakumar Sharma
राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और भावात्मक एकीकरण में अहिल्याबाई का योगदान अविस्मरणीय है – प्रो. शर्मा
लोकमाता अहिल्याबाई होलकर : राष्ट्रीय और सांस्कृतिक योगदान पर केंद्रित राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी
देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी लोकमाता अहिल्याबाई होलकर : राष्ट्रीय और सांस्कृतिक योगदान पर केंद्रित थी। संगोष्ठी के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार श्री सुनील गणेश मतकर, इंदौर थे। विशिष्ट वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कला संकायाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। मुख्य अतिथि प्राचार्य डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे थे। अध्यक्षता नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के महामंत्री डॉ हरिसिंह पाल ने की। आयोजन के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर, श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉ ममता झा, मुंबई एवं राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर प्रभु चौधरी थे। संगोष्ठी का सूत्र संयोजन डॉ पूर्णिमा कौशिक रायपुर ने किया।
मुख्य वक्ता के रूप में इंदौर के श्री सुनील गणेश मतकर ने कहा कि अहिल्याबाई होल्कर की दृष्टि अत्यंत व्यापक थी। उन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। इसके साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों के उत्थान के लिए नई परंपराओं का सूत्रपात किया। प्रजा के दुख दर्द को वे स्वयं सुनती थीं और उनकी जरूरत के अनुसार पर्याप्त सहायता देती थीं। श्री मतकर ने अहिल्या जी के द्वारा किए गए विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों का विवरण प्रस्तुत किया। साथ ही अपने पिताजी डॉ गणेश मतकर द्वारा उनके संदर्भ में लिखी गई पुस्तकों एवं नाट्य प्रदर्शनों का जिक्र किया। श्री सुनील ने अति संक्षेप में महेश्वर, इंदौर, कंपेल, देवगुराडिया के साथ खासगी ट्रस्ट से संबंधित रोचक प्रसंगों की जानकारियां दीं।
विशिष्ट वक्ता उज्जैन के डॉ शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि अहिल्यादेवी होलकर सही अर्थों में राष्ट्रमाता थीं। उन्होंने दशकों पूर्व राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और भावात्मक एकीकरण का अविस्मरणीय प्रयास किया। देवालयों और सांस्कृतिक प्रतीकों के जीर्णोद्धार और नव निर्माण का अत्यंत साहसिक कार्य उन्होंने किया। उनका योगदान ऐतिहासिक है। उन्होंने प्रभावी राज्यशैली, धर्मपरायणता और बुद्धिमत्ता की मिसाल पेश की। उनके अवदान मात्र होलकर राज्य तक सीमित नहीं है, वरन संपूर्ण भारत और विश्व में एक अवतारी नारी के रूप में उनका स्मरण किया जाता है। उन्होंने इस संदर्भ में जान मालकम द्वारा उनके संबंध में लिखे गए प्रसंगों को भी उद्धृत किया। श्री शर्मा ने कहा कि अहिल्या जी को याद करना भारतीय संस्कृति के उदात्त पक्षों को याद करना है, जिनका उन्होंने आजीवन संरक्षण किया। अहिल्यादेवी कर्तव्यपरायण धार्मिक एवं समाजसेवी होने से लोकमाता बनीं।
हिंदी परिवार, इंदौर के अध्यक्ष हरेराम वाजपेयी ने कहा कि लोकमाता अहिल्या जी की नगरी में मैं रह कर अपने आप को धन्य समझता हूं। इंदौर शहर हर रोज, हर जगह अहिल्या जी को सादर नमन करता है। उन्होंने उनके नाम से इंदौर में विश्वविद्यालय, हवाई अड्डा, चेंबर ऑफ कॉमर्स, मार्ग, कालोनियों, शासकीय पुस्तकालय, गौशाला आदि सहित करीब डेढ़ दर्जन संस्थाओं के नामों का उल्लेख किया। साथ ही उनके संदर्भ में लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा ताई महाजन, डॉक्टर गणेश मतकर, अरविंद जवलेकर आदि द्वारा अहिल्या जी पर लिखी गई पुस्तकों के संदर्भ के साथ अपने उस आलेख का जिक्र किया, जो कक्षा सातवीं के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया है। अहिल्याजी के नाम से मध्य प्रदेश शासन भारत की उस महिला को सम्मान पत्र और दो लाख की राशि प्रदान करता है, जो समाज सेवा में अग्रणी भूमिका निभाती है।
मुख्य अतिथि पुणे के प्राचार्य डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख ने अहिल्या जी के कृतित्व, व्यक्तित्व तथा उनके धार्मिक - सामाजिक कार्यों के संदर्भ में अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि देवी अहिल्या ने भारत के गौरव को बढ़ाया। उन्होंने जीवन भर दुख एवं संकट के क्षणों के बीच प्रभु की इच्छा के अनुरूप अपना कार्य किया। उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रेरणादायी था। उन्होंने सामाजिक क्रांति की। वे न्याय, प्रशासन और वीरता की मिसाल थीं। उन्होंने अपनी आत्मशक्ति के बल पर लोक कल्याण का कार्य किया। उनकी राज्य व्यवस्था न्याय और क्षमता पर आधारित थी उन्होंने देश में अनेक शिव मंदिरों की स्थापना की। युगों युगों तक देवी अहिल्या को याद किया जाएगा।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डॉ हरिसिंह पाल, नई दिल्ली ने कहा कि देवी अहिल्या भारतीय परंपरा में नारी सशक्तीकरण की मिसाल हैं। वे सर्व धर्म समभाव के लिए आजीवन समर्पित रहीं। उनके योगदान से नई पीढ़ी को जोड़ने का कार्य किया जाना चाहिए। वरिष्ठ इतिहासकार डॉ गणेश मतकर अहिल्यादेवी पर केंद्रित नाटक का मंचन करते थे, जो बहुत लोकप्रिय हुआ।
मुंबई की श्रीमती सुवर्णा जाधव ने कहा कि महाराष्ट्र की बेटी को मालवांचल ने जो सम्मान दिया, वह अद्वितीय है। अहिल्याबाई होलकर न्यायप्रिय और बहादुर थीं। वे सही अर्थों में महिला शक्ति की प्रतीक हैं। उन्होंने अनेक धार्मिक कार्य किए। सामान्य परिवार में जन्मी अहिल्यादेवी ने बाल्यावस्था से ही दया और सेवा भावना के उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने स्त्रियों की सेना बनाई। वे धार्मिक सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति थीं।
डॉक्टर ममता झा, मुंबई ने कहा कि अहिल्याबाई होलकर ने अपने कार्यों से शक्ति और बुद्धिमत्ता के तालमेल की मिसाल प्रस्तुत की। उनका व्यक्तित्व दो सौ वर्ष पूर्व स्त्री सशक्तीकरण का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने माहेश्वरी साड़ी की कला को विश्व ख्याति दिलाई।
आयोजन की संयोजिका डॉ पूर्णिमा कौशिक रायपुर में अहिल्याबाई होल्कर पर केंद्रित गीतमय स्लाइड प्रेजेंटेशन किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में सरस्वती वंदना डॉक्टर संगीता पाल, कच्छ, गुजरात ने की। अतिथि परिचय साहित्यकार श्री जी डी अग्रवाल, इंदौर ने दिया। स्वागत भाषण डॉक्टर शिवा लोहारिया जयपुर ने प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी में डॉक्टर ममता झा, मुंबई, डॉक्टर शिवा लोहारिया, जयपुर, डॉ रोहिणी डाबरे, अहमदनगर, डॉ विमल चंद्र जैन इंदौर, डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर, डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, मुंबई, डॉक्टर गरिमा गर्ग, पंचकूला, डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर, डॉ सुनीता चौहान, डॉ सुनीता गर्ग, डॉ ख्याति पुरोहित, अहमदाबाद, श्री अशोक भागवत, श्री बलजीत पाल, श्री बलवंत पाल, नीतू पांचाल, पल्लवी पाटील आदि सहित अनेक शिक्षाविद, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं गणमान्यजन उपस्थित थे।
राष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद ने किया।
देवी अहिल्या जन्मोत्सव
20210531
हिंदी पत्रकारिता : इक्कीसवीं सदी की चुनौतियां और संभावनाएं - प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा | Hindi Journalism: Challenges and Prospects of the Twenty-First Century : Prof. Shailendra Kumar Sharma
प्रामाणिकता और मौलिकता के कारण निरन्तर आगे बढ़ेगी हिंदी पत्रकारिता – प्रो. शर्मा
हिंदी पत्रकारिता : इक्कीसवीं सदी की चुनौतियां और संभावनाएं पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी
साहित्य और संस्कृतिकर्म की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी आयोजन किया गया। यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी हिंदी पत्रकारिता : इक्कीसवीं सदी की चुनौतियां और संभावनाएं पर केंद्रित थी। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल त्रिवेदी, इंदौर थे। मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कला संकायाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने की। आयोजन के विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे, श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, श्रीमती हीना तिवारी, पत्रकार डॉ राकेश छोकर, नई दिल्ली, राष्ट्रीय मुख्य संयोजक प्राचार्य डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे एवं राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर प्रभु चौधरी थे। संगोष्ठी का सूत्र संयोजन डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद ने किया।
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आयोजित इस संगोष्ठी के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल त्रिवेदी, इंदौर ने कहा कि आज अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बहुत बड़े बदलाव हो रहे हैं। ऐसे में पत्रकारिता की पुनर्परिभाषा आवश्यक है। समाज और शासन - प्रशासन का दायित्व है कि वे पत्रकारिता पर विश्वास करें। वर्तमान में विपरीत परिस्थितियों में पत्रकार काम कर रहे हैं। उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत चुनौतीपूर्ण है। पत्रकारिता को लेकर विश्वास का वातावरण बनाने के लिए संपादक नामक संस्था को पुनर्जीवित करना आवश्यक है।
आयोजन के मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि नई तकनीक हिंदी पत्रकारिता के समक्ष कई चुनौतियाँ पैदा कर रही है तो इससे नई संभावनाएं भी उद्घाटित हो रही हैं। आने वाले दौर में प्रामाणिकता और मौलिकता के कारण हिंदी पत्रकारिता मजबूती के साथ आगे बढ़ेगी। यद्यपि भारत में इसका आगमन पश्चिम की देन है, किंतु जल्द ही इसने सैकड़ों वर्षों की निद्रा में सोये भारत में नवचेतना का संचार किया और सामाजिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता में अविस्मरणीय भूमिका निभाई है। हिंदी पत्रकारिता ने दशकों पूर्व संघर्षों के बीच से रास्ता निकाला है। यह राजपथ नहीं, लोक पथ पर चलकर ही आगे बढ़ी है। तमाम चुनौतियों के बावजूद विश्वसनीयता, जवाबदेही, गुणवत्ता और सत्यनिष्ठा की संवाहिका बनकर हिंदी पत्रकारिता सदैव जिंदा रहेगी। महात्मा गांधी ने सेवा को पत्रकारिता का एकमात्र लक्ष्य माना था। कोविड-19 के दौर में सेवापथ पर चलते हुए अनेक पत्रकारों और मीडियाकर्मियों ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया और अनेक इस संक्रमण से जूझते रहे हैं।
विशिष्ट अतिथि श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई ने कहा कि नई तकनीक खबरों को तेजी से फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अन्याय के विरुद्ध न्याय दिलाने का कार्य पत्रकारिता करती है। सच बोलने के लिए अनेक पत्रकारों ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में हिंदी परिवार के संस्थापक एवं साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता सच्चाई के बल पर टिकी रहेगी। अखबारों में सकारात्मक समाचारों के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए। जब पत्रकारिता सशक्त होगी, तभी समाज स्वस्थ होगा। आज सोशल मीडिया से ज्यादा विश्वास प्रिंट पत्रकारिता में प्रकाशित ख़बर को लेकर किया जाता है।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ राकेश छोकर, नई दिल्ली ने कहा कि पत्रकारिता सूचना संप्रेषण का महत्वपूर्ण माध्यम है। यह जनमानस से जुड़ने की विशिष्ट पद्धति है। समय के साथ पत्रकारिता में व्यापक बदलाव आ रहे हैं।
स्वागत भाषण देते हुए प्राचार्य डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे ने कहा कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। लोक कल्याण की भावना ने पत्रकारिता को जन्म दिया है। यह बदलते समय के साथ दूरदर्शिता और भविष्य का नियमन करती है।
कार्यक्रम की प्रस्तावना डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर ने प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के कारण दुनिया भर में हिंदी भाषा का परचम लहरा रहा है। भारतेंदु युग से हिंदी पत्रकारिता को नई भाषा, नया तेवर मिला। तकनीकी के विकास से पत्रकारिता के क्षेत्र में ई - कम्युनिकेशन का दौरा गया है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में सरस्वती वंदना संयोजक डॉ सुनीता गर्ग, पंचकूला, हरियाणा ने की। अतिथि परिचय संस्था के महासचिव डॉक्टर प्रभु चौधरी ने दिया।
संगोष्ठी में डॉक्टर रोहिणी डाबरे, अहमदनगर, डॉ विमल चंद्र जैन इंदौर, डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर, डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, मुंबई, डॉक्टर गरिमा गर्ग, पंचकूला, डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर, रजनी तिवारी, अनीता चौहान, डॉ सुनीता गर्ग, डॉ सुनीता चौहान, डॉ श्वेता पंड्या, शुभम माहोर, उमंग पाल आदि सहित अनेक शिक्षाविद, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं गणमान्यजन उपस्थित थे।
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन महिला इकाई की मुख्य महासचिव डॉक्टर डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद ने किया। आभार प्रदर्शन उप महासचिव डॉक्टर गरिमा गर्ग, पंचकूला, हरियाणा ने किया।
हिंदी पत्रकारिता दिवस
20210528
गौतम बुद्ध : वैश्विक चिंतन एवं संस्कृति को अवदान - प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा | Gautam Buddha: Contribution to Global Thought and Culture - Prof. Shailendra Kumar Sharma
हिंसा और आतंक से जूझते विश्व को बुद्ध के प्रेम, मैत्री और करुणा की जरूरत है – प्रो. शर्मा
गौतम बुद्ध : वैश्विक चिंतन एवं संस्कृति को अवदान पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी
देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी आयोजन किया गया। अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी गौतम बुद्ध : वैश्विक चिंतन एवं संस्कृति को अवदान पर केंद्रित थी। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे थे। मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कला संकायाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ जी डी अग्रवाल, इंदौर ने की। आयोजन के विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय मुख्य संयोजक प्राचार्य डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे, श्री मोहनलाल वर्मा, जयपुर, डॉक्टर वरुण गुलाटी, नई दिल्ली, सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉक्टर ममता झा, मुंबई, योगाचार्य डॉ निशा जोशी, इंदौर, हिंदी परिवार के संस्थापक श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर एवं राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर प्रभु चौधरी थे। संगोष्ठी का सूत्र संयोजन डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर ने किया।
आयोजन के मुख्य अतिथि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि गौतम बुद्ध जीवन में शील और बुद्धि की प्रतिष्ठा करते हैं। उनका स्मरण करना अपने जीवन में व्यापक परिवर्तन लाना है। हिंसा, युद्ध और आतंक से जूझते विश्व को बुद्ध के प्रेम, मैत्री और करुणा की जरूरत है। वे हमें सभी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त कर सत्य को अंगीकार करने पर बल देते हैं। बुद्ध का संदेश है कि सभी प्रकार के दुखों के कारण तृष्णा को सुखाने से दुख का पूर्ण नाश संभव है। उन्होंने नए प्रकार के मनुष्य और समाज की रचना का उपक्रम किया। वे एक गहरे समाजशास्त्री के रूप में सामाजिक समानता और न्याय का संदेश देते हैं। उन्होंने प्रज्ञा की आंख से धम्म को देखने का आव्हान किया वर्तमान में विश्व को बुद्ध के उपदेशों की आवश्यकता है। उनकी दृष्टि हमें पावन करती है।
प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेश चन्द्र शुक्ल, शरद आलोक, ऑस्लो, नॉर्वे ने कहा कि बुद्ध ने मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक विभिन्न मंगल कर्म बताए हैं। उन्हें अंगीकार कर जीवन को परिवर्तित किया जा सकता है। बुद्ध का संदेश है कि खुशी बांटने से होती है, संचित करने से नहीं। श्री शुक्ल ने अपनी कविता करुणा के सागर गौतम बुद्ध सुनाई।
विशिष्ट अतिथि डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे ने कहा कि बुद्ध ने तृष्णा और आसक्ति को मानव जीवन के दुख के कारण माना। इनसे मुक्त होना आवश्यक है। वे मध्यम मार्ग को दिखाते हैं। गौतम बुद्ध की दृष्टि वैज्ञानिक थी। उनकी शिक्षा से मनुष्य मानसिक स्वास्थ्य और आत्मिक शांति को प्राप्त कर सकता है। उनकी शिक्षा को व्यवहार में लाकर हम अपना जीवन सफल कर सकते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री जी डी अग्रवाल, इंदौर ने कहा कि बुद्ध ने युवावस्था में ही सांसारिक आकर्षणों से मुक्ति की राह अपनाई थी। बुद्ध की शिक्षा ग्रहण करने से हमारा जीवन सार्थक हो सकता है। उन्होंने भगवान बुद्ध को समर्पित अपनी कविता सुनाई, जिसकी पंक्तियां थीं, दो ऐसा आशीष सृष्टि यह निर्भय हो, करुणा के अवतार तुम्हारी जय हो।
संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई ने कहा कि गौतम बुद्ध ने मानव मात्र के कल्याण के उपदेश दिए। उनकी आगमन से वैश्विक क्रांति हुई। गौतम बुद्ध ने आम व्यक्ति को योग से जोड़ा। उन्होंने चार आर्य सत्य एवं अष्टांग मार्ग का उपदेश दिया। बौद्ध धर्म जीवन का चरम लक्ष्य निर्वाण को मानता है। यह आज संपूर्ण विश्व में लोकप्रिय है। बुद्ध ने न अधिक भोग और न अधिक त्याग की बात कर मध्यम मार्ग सुझाया।
विशिष्ट अतिथि डॉ वरुण गुलाटी, नई दिल्ली ने कहा कि बुद्ध का उद्देश्य सहज मार्ग दिखाना था। बुद्ध के विचारों से सभी वर्गों के लिए निर्वाण का रास्ता खुल गया। उन्होंने सम्यक् ज्ञान का प्रचार किया, जिससे सामान जन भी उनसे जुड़ गए। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में वे विशिष्ट मानदंड देते हैं। उनका अष्टांग मार्ग कल्याणकारी राज्य के लिए अत्यंत उपादेय है। बुद्ध ने जाति विषमता का निषेध कर समानता का मार्ग सुझाया।
विशिष्ट अतिथि डॉ ममता झा, मुंबई ने कहा कि बुद्ध आज भी सामयिक हैं। उनकी शिक्षा से जीवन में तमाम प्रकार की मुश्किलों और संघर्ष से मुक्त हुआ जा सकता है। बुद्ध की दृष्टि में प्रत्येक दुख के मूल में तृष्णा है। उसे समाप्त कर हमारा जीवन प्रकाशमय बन सकता है। श्रीमती झा ने बुद्ध के जीवन से जुड़ा हुआ एक प्रसंग सुनाया, जिसमें उनकी क्षमा, संयम, त्याग और अहिंसा की प्रवृत्ति का परिचय मिलता है।
वरिष्ठ समाजसेवी श्री मोहनलाल वर्मा, जयपुर ने कहा कि भारत में अस्मिता का संघर्ष चल रहा है। बुद्ध ने जो कुछ कहा आज भी वह प्रासंगिक है। बुद्ध हमारे जीवन में भ्रांतियों के निराकरण का मार्ग दिखाते हैं। पूर्णता की प्राप्ति का ज्ञान गौतम बुद्ध को मिला था। उन्होंने दुख के निवारण के लिए अपने मन को निर्मल करने की आवश्यकता बताई। बुद्ध और महावीर – दोनों जीवन व्यवहार एवं विस्मृत ज्ञान को पुनः प्राप्त करने की याद दिलाते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने कहा कि गौतम बुद्ध का संदेश जीवन में नव चेतना जागृत करने का संदेश है। वे अपने अंदर के दीपक को जलाने की आवश्यकता बताते हैं, जो वर्तमान समय में उपादेय है।
योगाचार्य डॉ निशा जोशी, इंदौर ने कहा कि बुद्ध कभी बनते नहीं है, बुद्ध एक स्थिति है। गौतम बुद्ध की तरह आचरण करते हुए इसे हम सभी प्राप्त कर सकते हैं। बुद्ध जैसे व्यक्तित्व कभी मरते नहीं। जो व्यक्ति सम्यक् ज्ञान को प्राप्त करता है, वह सही अर्थ में बुद्ध है।
प्रस्तावना डॉ शैल चंद्रा, धमतरी, छत्तीसगढ ने प्रस्तुत करते हुए कहा कि गौतम बुद्ध ने लोगों को मध्यम मार्ग का संदेश दिया। उन्होंने हिंसा और पशु बलि का निषेध करते हुए पंचशील का सिद्धांत दिया, जो आज भी प्रासंगिक है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में सरस्वती वंदना डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर ने की। स्वागत भाषण डॉ गरिमा गर्ग, पंचकूला, हरियाणा ने दिया। संस्था का परिचय कार्यक्रम की संयोजक डॉ लता जोशी, मुंबई ने दिया।
अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन डॉक्टर मुक्ता कान्हा कौशिक रायपुर ने किया। आभार प्रदर्शन श्रीमती प्रभा बैरागी, उज्जैन ने किया।
संगोष्ठी में डॉ विमल चंद्र जैन इंदौर, डॉक्टर जी डी अग्रवाल, इंदौर, डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर, डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, मुंबई, डॉक्टर गरिमा गर्ग, पंचकूला, डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर, डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर, डॉ मनीषा सिंह, श्री मोहनलाल वर्मा, डॉक्टर रोहिणी डाबरे, अहमदनगर, डॉक्टर शहनाज अहमद, डॉ सुनीता चौहान, मुंबई, डॉ रामनिवास साहू, बिलासपुर, डॉक्टर पूर्णिमा जेंडे, डाक्टर प्रतिभा जी येरेकर, डॉक्टर गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी, प्रयागराज आदि सहित अनेक शिक्षाविद, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं गणमान्यजन उपस्थित थे।
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