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20201227

प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा से सुखरामसिंह तोमर का साक्षात्कार | Interview with Prof. Shailendra Kumar Sharma

समय-समय पर नित नए माध्यमों और रूपों की तलाश करता है साहित्य – प्रो शर्मा

विदेशों में फहराया है डॉ शर्मा ने हिंदी का परचम

लेखक एवं आलोचक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा से सुखरामसिंह तोमर  का साक्षात्कार)

समालोचक, निबंधकार और लोक संस्कृतिविद् डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा का जन्म भारत के प्रमुख सांस्कृतिक नगर उज्जैन में हुआ। उन्होंने उच्च शिक्षा देश के प्रतिष्ठित विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से प्राप्त की। वर्तमान में वे विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिन्दी विभाग के आचार्य, विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक के रूप में कार्यरत हैं। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए डॉ. शर्मा ने अनेक नवाचारी उपक्रम किए हैं, जिनमें विश्व हिंदी संग्रहालय एवं अभिलेखन केंद्र, मालवी लोक साहित्य एवं संस्कृति केंद्र तथा भारतीय जनजातीय साहित्य एवं संस्कृति केंद्र, गुुुुरुनानक अध्ययन केंद्र एवं भारतीय भक्ति साहित्य केंद्र की संकल्पना एवं स्थापना प्रमुख हैं। 

प्रो शर्मा विगत तीन दशकों से आलोचना, नाटक तथा रंगमंच समीक्षा, लोकसाहित्य एवं संस्कृति के विमर्श, राजभाषा हिन्दी एवं देवनागरी के विविध पक्षों पर अनुसंधान एवं लेखन कार्य में निरंतर सक्रिय हैं। वे अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका अक्षरवार्ता के प्रधान संपादक हैं।



विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के गांधी अध्ययन केंद्र के निदेशक के रूप में उन्होंने विगत वर्ष महात्मा गांधी के 150 वें जयंती वर्ष पर देश – दुनिया की किसी भी संस्था के माध्यम से सर्वाधिक गतिविधियों और नवाचारों का समन्वय किया। साहित्य विश्व के लिए उनके समक्ष कुछ सवाल रखे तो उन्होंने इस प्रकार जवाब दिये-



साहित्य की ओर आपका रुझान कब से और कैसे हुआ?

साहित्य की ओर रुझान के पीछे मुख्य प्रेरक मेरे पिता स्वर्गीय श्री प्रेमनारायण शर्मा रहे हैं। उन्होंने मेरे बालपन से ही साहित्य के संस्कार डाले। वे स्वयं कानून के क्षेत्र से जुड़े हुए थे, किंतु उन्होंने साहित्य को उस शुष्क दुनिया से बाहर आने का और व्यापक संवेदना से जुड़ने का माध्यम बनाया था। वे अत्यधिक व्यस्त रहते थे, लेकिन अपने समय की श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं और रचनाओं के आस्वाद का अवसर निकालते थे। हमारे यहाँ कादंबिनी, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, नवनीत जैसी पत्रिकाएं नियमित रूप से आती थीं, वहीं श्रेष्ठ साहित्य के पठन का अवसर मिलता था। उन्हीं पत्रिकाओं और साहित्यिक कृतियों के साहचर्य से साहित्य के साथ जुड़ाव होता चला गया। फिर साइंस में स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद अग्रज डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए तैयार किया। 

उच्च अध्ययन और अनुसंधान के दौर में विख्यात समालोचक गुरुवर आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी, आचार्य बच्चूलाल अवस्थी और आचार्य कमलेशदत्त त्रिपाठी के संपर्क में आया। उनकी प्रेरणा से लेखन को दिशा मिलती गई।


आपने अब तक कितनी पुस्तकों का लेखन और  सम्पादन किया है?


अब तक लगभग पैंतीस से अधिक पुस्तकों का लेखन एवं सम्पादन किया है। इनमें प्रमुख हैं, शब्दशक्ति संबंधी भारतीय और पाश्चात्य अवधारणा तथा हिन्दी काव्यशास्त्र, देवनागरी विमर्श, मालवा का लोकनाट्य माच और अन्य विधाएं, हिंदी भीली अध्येता कोश, महात्मा गांधी : विचार और नवाचार, सिंहस्थ विमर्श, हिन्दी भाषा संरचना, मालवी भाषा और साहित्य, अवन्ती क्षेत्र और सिंहस्थ महापर्व, प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य, हिंदी कथा साहित्य, मालव सुत पं सूर्यनारायण व्यास, आचार्य नित्यानंद शास्त्री और रामकथा कल्पलता, हरियाले आंचल का हरकारा : हरीश निगम, हिन्दी नाटक, निबंध तथा स्फुट गद्य विधाएँ एवं मालवी भाषा साहित्य, मालव मनोहर, हिंदी भाषा और नैतिक मूल्य, हरीश प्रधान- व्यक्ति और काव्य, स्त्री विमर्श : परंपरा और नवीन आयाम, ज्ञानसेतु आदि। इनके अलावा एक हजार से अधिक आलोचनात्मक निबन्ध, शोध आलेख एवं टिप्पणियों का लेखन किया है, जो देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।


आप विश्व में कई स्थानों पर गए हैं, वहां हिंदी की क्या स्थिति पाते हैं?


देश देशांतर में हिन्दी निरन्तर आगे बढ़ रही है। यह विदेशों में बसे करोड़ों भारतवंशियों के लिए भारतीय संस्कृति, मूल्यों और जीवनशैली के साथ जुड़े रहने का सेतु बना रही है। अपनी थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस और म्यांमार की यात्राओं के दौरान मैंने पाया कि वहाँ हिंदी के प्रयोग की अलग-अलग स्थितियाँ हैं।




आपको किन संस्थाओं द्वारा अब तक पुरस्कृत और सम्मानित किया गया?


अब तक प्राप्त प्रमुख सम्मानों की संख्या पच्चीस से अधिक है। इनमें उल्लेखनीय हैं, संतोष तिवारी समीक्षा सम्मान, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय सम्मान, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय सम्मान, अक्षरादित्य सम्मान, साहित्य सिंधु सम्मान, लोक संस्कृति सम्मान, आचार्य विनोबा भावे राष्ट्रीय देवनागरी लिपि सम्मान, अखिल भारतीय राजभाषा सम्मान, शब्द साहित्य सम्मान, अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान, आलोचना भूषण सम्मान, राष्ट्रीय कबीर सम्मान, हिन्दी भाषा भूषण सम्मान आदि।


आपके पसन्दीदा साहित्यकार कौन हैं?


पसन्दीदा साहित्यकार कई हैं। उनमें संस्कृत, हिंदी और मालवी के कवि, कथाकार, नाटककारों के साथ अनेक लोक कवि और वाचिक परम्परा की रचनाओं के कई अलक्षित – अज्ञात सर्जक भी हैं। फिर भी नामोल्लेख जरूरी हो तो वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, शूद्रक, कबीर, रैदास, पीपा जी, तुलसीदास, सूरदास, मीरा, रसखान, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, निराला, प्रसाद, अज्ञेय, मुक्तिबोध, हजारीप्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, कुबेरनाथ राय, सुरेंद्र वर्मा आदि मेरे प्रिय रचनाकार हैं। 


लोक कवियों में  आनंदराव दुबे, हरीश निगम, नरहरि पटेल, भावसार बा, बालकवि बैरागी आदि का नाम लेना चाहूंगा। इधर माच के खेलों में गुरु बालमुकुंद जी से लेकर श्री सिद्धेश्वर सेन तक कई माचकारों की रचनाएं पसंद हैं। फिर लोक कन्ठानुकंठ में जीवन्त लोकगीतों, कथा - वार्ताओं के अनाम रचनाकारों को कैसे विस्मृत कर सकता हूँ?


मोबाइल फोन में डूबी नई पीढ़ी साहित्य की ओर आकर्षित हो, इस हेतु क्या किया जाना आवश्यक है?


प्रो शर्मा : साहित्य समय-समय पर नित नए माध्यमों और रूपों की तलाश करता है। युवा पीढ़ी स्तरीय साहित्य से जुड़ना - पढ़ना चाहती है, किंतु उन तक साहित्य भली भांति पहुंच नहीं रहा है। उसके बजाय मन बहलाव और भटकाव देने वाली गैर जरूरी सामग्री पहुंच रही है। युवाओं में संवेदनशीलता के विस्तार के लिए साहित्य के साथ उन्हें जोड़ने की जरूरत है। इस दृष्टि से श्रेष्ठ सृजन को नए माध्यमों के साथ गतिशील बनाया जाए, यह आवश्यक है। 


हमारी परम्परा के महान रचनाकारों की प्रतिनिधि रचनाओं को डिजिटल रूप में लाने के साथ उन्हें दृश्य - श्रव्य माध्यमों के जरिए भी उन तक पहुंचाया जाए। इसी तरह बालपन से ही साहित्य के संस्कार डाले जाने आवश्यक है। इस दिशा में शैक्षणिक और साहित्यिक संस्थाएं, पत्र – पत्रिकाएं, सोश्यल मीडिया और वेबसाइट्स महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। 


- सुखरामसिंह तोमर, अक्षर विश्व 

महामना मदनमोहन मालवीय : राष्ट्रीय आंदोलन, शिक्षा और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा | Madanamohan Malviya : Context of Indian National Movement, Education & Culture - Prof. Shailendra Kumar Sharma

आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के  समर्थक थे महामना मालवीय जी  – प्रो शर्मा 

महामना मालवीय जी और भारतरत्न अटल जी पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी   

महामना मालवीय जी : राष्ट्रीय आंदोलन, शिक्षा और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य एवं भारतरत्न  अटलबिहारी वाजपेयी के वैचारिक और साहित्यिक योगदान पर हुआ मंथन


देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा महामना मदनमोहन मालवीय और श्री अटलबिहारी वाजपेयी के विविधायामी योगदान पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश - दुनिया के अनेक विद्वान वक्ताओं और साहित्यकारों ने भाग लिया।  यह संगोष्ठी महामना मदनमोहन मालवीय : भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, शिक्षा और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य और भारतरत्न श्री अटलबिहारी वाजपेयी : वैचारिक और साहित्यिक योगदान पर केंद्रित थी।


कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार एवं अनुवादक श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे थे। मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा थे।  संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि डॉ जी डी अग्रवाल, इंदौर, प्राचार्य डॉ शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे, शिक्षाविद् श्री ब्रजकिशोर शर्मा, उज्जैन, वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, वरिष्ठ पत्रकार डॉ शंभू पवार, झुंझुनू, महासचिव डॉ प्रभु चौधरी एवं उपस्थित वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने की।






वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार, पत्रकार एवं अनुवादक श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने कहा कि श्री अटलबिहारी वाजपेयी सरलता और सादगी की प्रतिमूर्ति थे। उनके काव्यात्मक भाषणों का गहरा असर होता था। अटल जी ने भारतीय राजनीति को  परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शुक्ल जी ने मालवीय जी और अटल जी पर केंद्रित स्वरचित गीत की पंक्तियां सुनाई, अटल के संकल्पों को, मालवीय के सपनों को, फिर मैं दोहराऊँगा। कोहराम मचाऊँगा, गीत नया गाऊंगा।






प्रमुख वक्ता लेखक और आलोचक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि महामना मदनमोहन मालवीय की जीवन दृष्टि के दो मूल आधार थे, ईश्वर भक्ति और देशभक्ति। इन दोनों का जैविक संश्लेषण और ईश्वरभक्ति का देशभक्ति में अवतरण उन्हें अद्वितीय बनाता है। आजाद भारत में अटल जी ने महामना की राष्ट्रीय भावना को आगे बढ़ाया। महामना मालवीय जी का विश्वास था कि मनुष्य के पशुत्व को ईश्वरत्व में परिणत करना ही धर्म है और निष्काम भाव से प्राणी मात्र की सेवा ही ईश्वर की वास्तविक आराधना है। महामना इस अर्थ में भारतीय आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं। पश्चिम का राष्ट्रवाद जहां दार्शनिक धरातल पर भौतिकवाद पर टिका हुआ है, वहीं भारतीय राष्ट्रवाद एक मानसिक और आध्यात्मिक प्रत्यय है। इसीलिए पश्चिमी राष्ट्रवाद प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का समर्थक हो जाता है, वहीं भारतीय राष्ट्रवाद मानव मात्र की समानता और बुद्धि एवं भावना के समन्वय पर बल देता है। वह वसुधैव कुटुंबकम् के प्रादर्श को सदैव अपनी दृष्टिपथ में रखता है। महामना ने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देश के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन को भी गति दी। उन्होंने धार्मिक वैमनस्य का विरोध किया। वे सभी धर्मों के रीति-रिवाजों में ऐसा सुधार चाहते थे, जिससे किसी के धार्मिक विचारों को ठेस ना पहुंचे। अटल जी की दृष्टि में भारत महज जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है। इस दृष्टि से महामना और अटल जी के चिंतन में निरंतरता दिखाई देती है।






अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने कहा कि महामना मदनमोहन मालवीय और अटलबिहारी वाजपेयी जी ने राष्ट्र को सर्वोपरि माना था। मालवीय जी के पूर्वजों का मालवा क्षेत्र से गहरा संबंध था। अटल जी ने बहुत बड़े जन समुदाय को प्रेरणा दी है। श्री वाजपेयी ने अपनी कविता की पंक्तियां सुनाई, तुम अटल रहे, तुम अटल रहोगे, दुनिया के दिल में सदा रहोगे।




विशिष्ट अतिथि शिक्षाविद् श्री ब्रजकिशोर शर्मा ने कहा कि महामना मदनमोहन मालवीय भारतीय संस्कृति के साक्षात प्रतिरूप थे। उनके जैसे व्यक्तित्व कभी कभार ही होते हैं। महात्मा गांधी उन्हें अपना बड़ा भाई मानते थे। उन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रभाषा हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया।  हिंदी भाषा और साहित्य के विविध पहलुओं पर उन्होंने पर्याप्त लेखन किया। महान पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनका योगदान अविस्मरणीय है।








प्राचार्य डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे ने कहा कि मालवीय जी महामना थे तो अटल जी उदारमना। दोनों ने समाज सेवा और राजनीति के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। पत्रकारिता को उन्होंने समाज जागरण का माध्यम बनाया था। मालवीय जी बहुत बड़े समाज सुधारक थे। उन्होंने सत्यमेव जयते के सूत्र को लोकप्रिय बनाया। अटल जी जनता की आशाओं और आकांक्षाओं को पूर्ण करने में आजीवन तत्पर रहे। देश और समाज के लिए कुछ करने की अभिलाषा से वे राजनीति में आए थे। उनकी कविताएं युवा पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं। वे सही अर्थों में अजातशत्रु थे। 




विशिष्ट अतिथि संस्था की राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डॉक्टर सुवर्णा जाधव, मुम्बई ने अटल जी के साहित्यिक व्यक्तित्व का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि अटल जी प्रखर कवि और पत्रकार थे। वे साहित्य और राजनीति दोनों को जीवन का अंग मानते थे। उनके भाषण वैचारिकता से संपन्न होते थे। उसमें उनका लेखक और राजनीतिक व्यक्तित्व उतरता था। श्रीमती जाधव ने अटल जी की कविता मौत से मेरी ठन गई सुनाई।





विशिष्ट अतिथि डॉक्टर जी डी अग्रवाल इंदौर ने कहा कि अटल जी ने अपनी रचनाधर्मिता को राजनीतिक व्यस्तताओं के बावजूद बरकरार रखा। श्री अग्रवाल ने अटल जी की चर्चित कविताएँ सुनाईं। इनमें मुख्य थीं, हार नहीं मानूंगा रार नहीं ठानूंगा और पेड़ के ऊपर खड़ा आदमी ऊंचा दिखाई देता है।




कार्यक्रम में इस वर्ष के अटलश्री सम्मान से अलंकृत किए जाने वाले साहित्यकारों की घोषणा की गई। इनमें श्रीमती आर्यमा सान्याल, इंदौर, डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर, श्री अनिल ओझा, इंदौर, श्री कमलेश दवे सहज, नागदा एवं डॉ आशीष नायक रायपुर सम्मिलित हैं। अटलश्री सम्मान से अलंकृत होने वाले साहित्यकार श्री अनिल ओझा इंदौर में आभार व्यक्त किया। 


डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर ने अटल जी पर केंद्रित अपना गीत सुनाया।




कार्यक्रम की प्रस्तावना संस्था के  महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि भारत के नवनिर्माण में महामना मालवीय जी और अटल जी का योगदान अविस्मरणीय है।  


संगोष्ठी के प्रारंभ में सरस्वती वंदना साहित्यकार डॉ गरिमा गर्ग, पंचकूला ने की। स्वागत भाषण डॉ डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद ने दिया। संस्था का परिचय और अतिथि स्वागत वरिष्ठ पत्रकार डॉ शंभू पंवार, झुंझुनू ने किया।  


अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में  संस्था की साहित्यकार श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डॉक्टर सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉ लता जोशी, मुंबई, डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर, डॉ आशीष नायक, रायपुर, डॉ शंभू पंवार, झुंझुनू, डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर, श्री अनिल ओझा, डॉक्टर शैल चंद्रा, धमतरी, डॉ राकेश छोकर, नई दिल्ली, डी पी शर्मा, डॉ संगीता पाल, कच्छ, डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर, डॉ रोहिणी डाबरे, अहमदनगर, डॉ प्रियंका द्विवेदी, प्रयागराज, श्रीमती हेमलता साहू, डॉ श्वेता पंड्या, डॉ संगीता हड़के, डॉक्टर दिव्या पांडे, इलाहाबाद, मनोज कुमार, रजिया शहनाज, डॉ अलका चौहान आदि सहित अनेक प्रतिभागियों ने भाग लिया।


अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ दिव्या पांडेय, प्रयागराज ने किया।












म 


महामना मालवीय जी और अटल जी की जयंती


20201219

माच : सम्पूर्ण लोक नाट्य के रूप में - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा | Mach : As a Total Theater - Shailendra Kumar Sharma

दुनिया के प्रमुख लोक नाट्यों के बीच अद्वितीय है मालवा का माच – प्रो शर्मा

सम्पूर्ण लोक नाट्य के रूप में मालवा के माच पर केंद्रित विशेष व्याख्यान 

अभिनव रंगमंडल द्वारा मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय, भोपाल के सहयोग से विस्तार कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित तीस दिवसीय प्रस्तुतिपरक कार्यशाला में रंग समीक्षक और विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने सम्पूर्ण लोक नाट्य के रूप में मालवा के माच पर विशिष्ट व्याख्यान दिया। कार्यशाला के समन्वयक अभिनव रंगमंडल के संस्थापक – अध्यक्ष श्री शरद शर्मा ने प्रास्ताविक वक्तव्य दिया। यह कार्यशाला कालिदास संस्कृत अकादमी के अभिरंग नाट्यगृह में आयोजित की जा रही है। 






मध्यप्रदेश के प्रतिनिधि लोकनाट्य माच पर अभिकेंद्रित विशेष व्याख्यान में विचार व्यक्त करते हुए प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि विश्व रंगमंच को भारतीय लोक नाट्य परम्परा की देन बहुमुखी है। सुदूर अतीत से एशियाई रंगकर्म को हमारी शास्त्रीय और लोक नाट्य परम्पराएँ प्रभावित करती आ रही हैं। दुनिया के प्रमुख लोक नाट्यों के बीच अद्वितीय विधा माच ने विगत लगभग सवा दो सौ वर्षों से रंगमंच के बहुत बड़े दर्शक वर्ग को प्रभावित किया है। लोक संगीत, नृत्य - रूपों, कथा, अभिनय, गीतों के जीवन्त समावेश से यह एक सम्पूर्ण नाट्य का रूप ले लेता है। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र विश्व संस्कृति को भारत की अनुपम देन है। माच में सुदूर अतीत से चली आ रही रंगमंच की विशिष्ट प्रवृत्तियों के दर्शन होते हैं। माच के खेलों में जीवन के कई रंगों की अभिव्यक्ति होती है। यह लोक विधा मात्र मनोरंजन का माध्यम नहीं है। व्यापक लोक समुदाय में चिरन्तन सत्य, उच्च आदर्शों और मूल्यों की प्रतिष्ठा के साथ सामाजिक बदलाव में माच ने अविस्मरणीय भूमिका निभाई है। इस विधा के विकास में गुरु गोपाल जी, गुरु बालमुकुंद जी, गुरु राधाकिशन जी, गुरु कालूराम जी, श्री सिद्धेश्वर सेन, श्री ओमप्रकाश शर्मा जैसे कई माचकारों ने योगदान दिया है। 


प्रो शर्मा ने माच के शिल्प और प्रदर्शन शैली पर प्रकाश डालते हुए कहा कि माच खुले मंच की विधा है। अनायास नाटकीयता और लचीलापन माच की शक्ति है। माच का मधुर संगीत इसे प्रभावी आधार देता है। इसके कलाकार मात्र अभिनेता नहीं, वे गायक – नर्तक - अभिनेता होते हैं। सामूहिक रूप से टेक झेलने और बोलों को दुहराने की क्रिया माच की खास पहचान है। माच कोरे यथार्थ के आग्रह को तोड़ता है। माच के रसिया स्वयं भैरव जी हैं। गुरु परम्परा के प्रति निष्ठा इस विधा में निरंतर बनी हुई है। कृषक और श्रमजीवी वर्ग के लोगों ने इस विधा को कला का दर्जा दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।   






प्रारम्भ में प्रास्ताविक वक्तव्य देते हुए संस्था के अध्यक्ष श्री शरद शर्मा ने कहा कि नाट्य संगीत के क्षेत्र में अभिनव रंगमंडल ने विशिष्ट योगदान दिया है। इस कार्यशाला के माध्यम से अभिनय कला के सभी आयामों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जिद और जुनून के बिना किसी भी कला में निष्णात होना असम्भव है।


इस अवसर पर रंगकर्मी वीरेंद्र नथानियल, भूषण जैन, विशाल मेहता आदि सहित रंग प्रशिक्षणार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। 


यूट्यूब चैनल पर माच की प्रस्तुतियाँ





























20201218

स्कन्दगुप्त - जयशंकर प्रसाद पाठ और समीक्षा | Skandagupt - Jaishankar Prasad -Text and Review

स्कन्दगुप्त - जयशंकर प्रसाद : पाठ और समीक्षा

Skandagupt - Jaishankar Prasad : Text and Review 

जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी 1890 - 15 नवम्बर 1937) हिन्दी के महान कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी कविता में एक तरह से छायावाद की स्थापना की, जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में न केवल कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई और कामायनी तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गया। बाद के प्रगतिशील एवं नयी कविता दोनों धाराओं के प्रमुख आलोचकों ने उसकी इस शक्तिमत्ता को स्वीकृति दी। इसका एक अतिरिक्त प्रभाव यह भी हुआ कि खड़ीबोली हिन्दी काव्य की निर्विवाद सिद्ध भाषा बन गयी।


आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में उनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे, जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास और निबन्ध के क्षेत्र में हिंदी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के प्रमुख स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं; नाटक लेखन में भारतेंदु के बाद वे एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे, जिनके नाटक आज भी पाठक न केवल चाव से पढ़ते हैं, बल्कि उनकी अर्थगर्भिता तथा रंगमंचीय प्रासंगिकता भी दिनानुदिन बढ़ती ही गयी है। 




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कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी उन्होंने कई यादगार कृतियाँ दीं। प्रसाद जी ने कंकाल, तितली, इरावती, जैसे उपन्यासों में समाज की घृणित और और ईर्ष्यापूर्ण मनोवृत्ति को उजागर किया। उन्होंने कंकाल में सामाजिक यथार्थ का चित्रण कर यह प्रमाणित किया कि वे अतीत में ही रमे रहने वाले रचनाकार नहीं थे, बल्कि उन्हें अपने समय के सामाजिक यथार्थ का भी गहरा बोध था।


प्रेमचंद युग में हिंदी कहानी को जयशंकर प्रसाद जैसी प्रतिभा मिली। इस दृष्टि से यह युग प्रेमचंद – प्रसाद युग के नाम से भी चर्चित है। दोनों महान रचनाकारों में से एक प्रेमचंद जहाँ कहानी को व्यापक सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से गतिशीलता दे रहे थे, वहीं प्रसाद उसके माध्यम से व्यक्ति की प्रतिष्ठा कर रहे थे। प्रेमचंद जहां कहानी के क्षेत्र में आदर्शोन्मुख यथार्थवादी परंपरा के प्रतिष्ठापक बने, वहीं प्रसाद भावमूलक परंपरा के। उस काल के अधिकांश कहानीकारों ने इन दोनों परंपराओं से अपने आप को जोड़ा।

छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा प्रवर्तित भावमूलक या स्वच्छंदता बोध की धारा ने महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। प्रेमचंद का रुझान जहां जीवन के चारों ओर फैले यथार्थ में था, वहीं प्रसाद का रुझान रूमानी था। प्रसाद का अनुराग संस्कृति और इतिहास के प्रति भी रहा है जो उनकी कहानियों के काल, चरित्रों और घटनाओं से प्रकट होता है। उनकी कहानियाँ वैयक्तिक भावनाओं के साथ स्थापित नैतिकता के द्वंद्व को सामने लाती हैं। प्रसाद जी ने लगभग 70 कहानियां लिखीं। उनकी प्रमुख कहानियों में आकाशदीप, पुरस्कार, प्रतिशोध, मधुआ, दासी, छोटा जादूगर आदि उल्लेखनीय हैं।

प्रसाद ने विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन किया। 48 वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ की।

उन्हें 'कामायनी' पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था। उन्होंने जीवन में कभी साहित्य को अर्जन का माध्यम नहीं बनाया, अपितु वे साधना समझकर ही साहित्य की रचना करते रहे। कुल मिलाकर ऐसी बहुआयामी प्रतिभा का साहित्यकार हिंदी में कम ही मिलेंगे, जिन्होंने साहित्य के सभी अंगों को अपनी कृतियों से न केवल समृद्ध किया हो, बल्कि उन सभी विधाओं में काफी ऊँचा स्थान भी रखते हों।

स्कन्दगुप्त नाटक :

स्कन्दगुप्त नाटक भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाओं में से एक है। इस नाटक में इतिहास प्रसिद्ध स्कन्दगुप्त को नायक बनाया गया है। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में आत्म गौरव को जगाने की चेष्टा की। जयशंकर प्रसाद ने स्वतंत्रता के स्वयंप्रभा और समुज्ज्वला रूप की महिमा गाई है, जो आज और अधिक प्रासंगिक हो गई है।

स्कन्दगुप्त प्राचीन भारत में तीसरी से पाँचवीं सदी तक शासन करने वाले गुप्त राजवंश के आठवें राजा थे। इनकी राजधानी पाटलिपुत्र थी जो वर्तमान समय में पटना के रूप में बिहार की राजधानी है। स्कन्दगुप्त ने जितने वर्षों तक शासन किया उतने वर्षों तक युद्ध किया। भारत की बर्बर हूणों से रक्षा करने का श्रेय स्कन्दगुप्त को जाता है। हूण मध्य एशिया में निवास करने वाले बर्बर कबीलाई लोग थे। उन्होंने हिन्दु कुश पार कर गन्धार पर अधिकार कर लिया और फिर महान गुप्त साम्राज्य पर धावा बोला। परंतु वीर स्कन्दगुप्त ने उनका सफल प्रतिरोध कर उन्हें खदेड़ दिया। हूणों के अतिरिक्त उसने पुष्यमित्रों को भी विभिन्न संघर्षों में पराजित किया। पुष्यमित्रों को परास्त कर अपने नेतृत्व की योग्यता और शौर्य को सिद्ध कर स्कन्दगुप्त ने विक्रमादित्य कि उपाधि धारण की. उसने विष्णु स्तम्भ का निर्माण करवाया।

प्रसाद कृत स्कन्दगुप्त में पाँच अंक हैं तथा अध्यायों की योजना दृश्यों पर आधारित है। प्रथम, द्वितीय तथा चतुर्थ अंक में सात और तृतीय तथा पंचम अंक में छह दृश्य हैं। इस नाटक की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए दशरथ ओझा हिन्दी नाटकः उद्भव और विकास में लिखते हैं कि- " 'स्कन्दगुप्त' नाटक के वस्तु-विन्यास में प्रसाद की प्रतिभा सजीव हो उठी है और उनकी नाट्यकला ने अपना अपूर्व कौशल दिखाया है। इस नाटक में भारतीय और यूरोपीय दोनों नाट्यकलाओं का सहज समन्वय है।"


जयशंकर प्रसाद का आत्मकथ्य


हमें इस नाटक के संबंध में भी कुछ कहना है। इसकी रचना के आधार पर दो मंतव्य स्थिर किए गए हैं : पहला यह कि उज्जयिनी का पर दु:खभंजन विक्रमादित्य गुप्तवंशीय स्कंदगुप्त था, दूसरा यह कि मातृगुप्त ही कालिदास था, जिसने रघुवंश आदि महाकाव्य बनाए।

स्कंदगुप्त का विक्रमादित्य होना तो प्रत्यक्ष प्रमाण उसे सिद्ध होता है क्षिप्रा से तुम्बी  में जल भरकर ले आने वाले और चटाई पर सोने वाले उज्जयिनी के विक्रमादित्य स्कंद गुप्त के ही साम्राज्य के खंडहर पर भोज के परमार पुरखों ने मालव का नवीन साम्राज्य बनाया था परंतु मातृगुप्त के कालिदास होने में अनुमान का विशेष संबंध है। हो सकता है कि आगे चलकर कोई प्रत्यक्ष प्रमाण भी मिल जाय, परन्तु हमें उसके लिये कोई आग्रह नहीं। इसलिये हमने नाटक में मातृगुप्त का ही प्रयोग किया है। मातृगुप्त का कश्मीर को शासन और तोरमाण का समय तो निश्चित-सा है । विक्रमादित्य के मरने पर उसका काश्मीर-राज्य छोड़ देता है, और वही समय सिहल के कुमार धातुसेन का निर्धारित होता है । इसलिये इस नाटक में धातुसेन भी एक पात्र हैं । बंधुवर्मा, चक्रपालित, पर्णदत, शर्वनाग, भटार्क, पृथ्वीसेन, खिंगिल, प्रख्यातकीर्ति, भीमवर्मा (इसका शिलालेख कोशाम्बी में मिला है), गोविन्दगुप्त, आदि सब ऐतिहासिक व्यक्ति हैं । इसमें प्रपंचबुद्धि और मुद्गल कल्पित पात्र है। स्त्रीपात्रों में स्कंद की जननी का नाम मैने देवकी रखा है; स्कंदगुप्त के एक शिलालेख हतरिपुरिव कृष्णो देवकीमभ्युपेतः मिलता है। सम्भव है कि स्कंद की माता के नाम देवकी ही से कवि को यह उपमा सूझो हो । अनन्तदेवी का ते स्पष्ट उल्लेख पुरगुप्त की माता के रूप में मिलता है । यही पुरगुप्त स्कंदगुप्त के बाद शासक हुआ है। देवसेना और जयमाला वास्तविक और काल्पनिक पात्र, दोनो हो सकते हैं । विजया, कमला, रामा और मालिनी-जैसी किसी दूसरी नामधारिणी स्त्री की भी उस काल मे सम्भावना है। तब भी ये कल्पित है । पात्रों की ऐतिहासिकता के विरुद्ध चरित्र की सृष्टि, जहाँ तक संभव हो सका है, न होने दी गई है। फिर भी कल्पना का अवलम्व लेना ही पड़ा है, केवल घटना की परम्परा ठीक करने के लिये ।   - प्रसाद


स्कन्दगुप्त : निवेदन से 

जयशंकर 'प्रसाद' के नाटकों ने हिंदी-साहित्य के एक अंग की बड़ी ही सुन्दर पूर्ति की है। उनकी कल्पना कितनी मार्मिक और उच्च कोटि की है---इसके विषय में कुछ कहना वाचालता मात्र होगी।

उनके नाटक हमारे स्थायी साहित्य के भंडार को अमूल्य रत्न देने के सिवा एक और महत् कार्य्य कर रहे हैं, वह है हमारे इतिहास का उद्धार। महाभारतयुग के 'नागयज्ञ' से लेकर हर्षकालीन 'राज्यश्री' प्रभृत्ति नाटकों से वे हमारे लुप्त इतिहास का पुनर्निर्माण कर रहे हैं। ऐसा करने में चाहे बहुत-सी बातें कल्पना-प्रसूत हों, किन्तु 'प्रसाद' जी की ये कल्पनाएँ ऐसी मार्मिक और अपने उद्दिष्ट समय के अनुकूल हैं कि वे उस सत्य की पूर्ति कर देती है जो विस्मृति के तिमिर में विलीन हो गया है।


किसी काल के इतिहास का जो गूदा है---अर्थात् महापुरुषों की वे करनियाँ जिनके कारण उस काल के इतिहास ने एक विशिष्ट रूप पाया है---उसे यदि कोई लेखक अपने पाठकों के सामने प्रत्यक्ष रख सके तो उसने झूठ नहीं कहा, वह सत्य ही है। चाहे वास्तविक हो वा कल्पित---


भगवान कृष्ण ने गीता के रूप में जो अमृत हमे दिया है उसका चाहे सौ पुराण सौ रूप में वर्णन करें, पर यदि उन रंगीन मटकों में से हम उस अमृत का पान कर सकते हैं तो वे सब-के-सब उसके लिये समुचित भाजन ही ठहरे---व्यर्थ के कृत्रिम आडम्बर नही।


गुप्त-काल (275 ई० - 540 ई० तक) अतीत भारत के उत्कर्ष का मध्याह्न है। उस समय आर्य्य-साम्राज्य मध्य-एशिया से जावा-सुमात्रा तक फैला हुआ था। समस्त एशिया पर हमारी संस्कृति का झंडाफहरा रहा था। इसी गुप्तवंश का सबसे उज्ज्वल नक्षत्र था---स्कंदगुप्त। उसके सिंहासन पर बैठने के पहले ही साम्राज्य में भीतरी षड्यंत्र उठ खड़े हुए थे। साथ ही आक्रमणकारी हूणों का आतंक देश में छा गया था और गुप्त-सिंहासन डाँवाडोल हो चला था। ऐसी दुरवस्था में लाखों विपत्तियाँ सहते हुए भी जिस लोकोत्तर उत्साह और पराक्रम से स्कंदगुप्त ने इस स्थिति से आर्य साम्राज्य की रक्षा की थी---पढ़कर नसों में बिजली दौड़ जाती हैं। अन्त में साम्राज्य का एक-छत्र चक्रवर्तित्व मिलने पर भी उसे अपने वैमात्र एवं विरोधी भाई पुरगुप्त के लिये त्याग देना, तथा, स्वयं आजन्म कौमार जीवन व्यतीत करने की प्रतिज्ञा करना---ऐसे प्रसंग हैं जो उसके महान चरित पर मुग्ध ही नहीं कर देते, बल्कि देर तक सहृदयों को करुणासागर में निमग्न कर देते हैं।




कई कारणों से इस नाटक के निकाल देने में कुछ हफ्तों की देर हो गई। किन्तु उतनी ही देरी साहित्य-प्रेमियों को---जो इसके स्वागत के लिये लालायित हो रहे थे--असह्य हो उठी है। उनके तगादे-पर-तगादे मिल रहे हैं। अतएव हम उनसे इस देर के लिये क्षमाप्रार्थी हैं।


श्रावणी पूर्णिमा,'८५ 

 -  प्रकाशक


20201216

देवनागरी लिपि : वैशिष्ट्य और संभावनाएं - प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा | Devnagri Lipi : Features and Possibilities - Shailendra Kumar Sharma

देश दुनिया की भाषाओं को परस्पर जोड़ने के लिए देवनागरी लिपि समर्थ है – प्रो शर्मा 

देवनागरी लिपि : वैशिष्ट्य और संभावनाएं पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी   

भाषा एवं लिपि के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ शहाबुद्दीन शेख का सारस्वत सम्मान


देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा देवनागरी लिपि : वैशिष्ट्य  और संभावनाएं पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश - दुनिया के अनेक विद्वान वक्ताओं और साहित्यकारों ने भाग लिया।

  कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार एवं अनुवादक श्री सुरेशचंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे थे। मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। संगोष्ठी में  भाषा एवं लिपि के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ  शिक्षाविद डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे का सारस्वत सम्मान किया गया। संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर शंभू पवार, झुंझुनू, श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर, महासचिव डॉ प्रभु चौधरी एवं उपस्थित वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष शिक्षाविद् श्री ब्रजकिशोर शर्मा, उज्जैन ने की।





वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार, पत्रकार एवं अनुवादक श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने कहा कि वर्तमान दौर में देवनागरी से जुड़े आत्म गौरव के भाव को जगाने की आवश्यकता है। देवनागरी के प्रयोग को राष्ट्रप्रेम का माध्यम बनाने के लिए सभी लोग प्रयत्नशील हों। उन्होंने अपनी एक कविता भी सुनाई।



लेखक एवं संस्कृतिविद् प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि देश दुनिया की समस्त भाषाओं के मध्य गहरी एकता विद्यमान है। इस एकता को और अधिक मजबूती देने के लिए देवनागरी लिपि महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। देश दुनिया की भाषाओं को लिपिबद्ध करने और उन्हें परस्पर जोड़ने के लिए देवनागरी लिपि सर्वाधिक समर्थ है। लिपिविहीन लोक और जनजातीय भाषाओं को जीवंत रखने के लिए देवनागरी लिपि का सशक्त आधार मिले, यह आवश्यक है। जिस तरह सात रंगों के समूहन से विराट सूर्य आकार लेता है, ठीक यही स्थिति भारत की विभिन्न भाषाओं की है। भाषाओं और बोलियों के मध्य सेतु बनाने का कार्य सदियों से देवनागरी लिपि करती आ रही है। सन अट्ठारह सौ बयासी  में गठित भारत के प्रथम शिक्षा आयोग ने अनेक विरोधों के बावजूद देश की जनजातीय बोलियों के लिप्यंकन के लिए देवनागरी लिपि को महत्व दिया था। नई शिक्षा नीति में  मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा पर बल दिया गया है। विभिन्न मातृभाषाओं को देवनागरी लिपि का आधार मिलना चाहिए, राष्ट्रीय भावात्मक एकता को बल मिलेगा। कुछ लोक भाषाओं में इस प्रकार की ध्वनियाँ मिलती हैं, जिनके लिए देवनागरी में उपयुक्त लिपि चिह्न नहीं हैं। इसके लिए देवनागरी के ही लिपि चिह्नों में संकेतक चिह्नों का प्रयोग कर उन विशिष्ट ध्वनियों को व्यक्त किया जा सकता है।



प्राचार्य शहाबुद्दीन नियाज़ मोहम्मद शेख ने कहा कि यदि भाषा शरीर है तो लिपि उस भाषा की आत्मा होती है| देवनागरी लिपि  एक समन्वित लिपि है| भारतीय संविधान के अष्टम अनुसूची में निर्दिष्ट 22 भाषाओं में से संस्कृत, हिंदी, मराठी, कोंकणी, मैथिली, संथाली, बोडो, डोगरी, सिंधी, नेपाली आदि 10 भाषाओं की लिपि देवनागरी का प्रयोग किया जाता है। आचार्य विनोबा भावे जी दस- बारह भाषाओं के ज्ञाता थे। उनका कहना था कि देवनागरी लिपि के माध्यम से किसी भी भाषा को आसानी से आत्मसात किया जा सकता है। वैश्विक लिपि के संदर्भ में देवनागरी एक आदर्श, कलात्मक, अक्षरात्मक तथा बौद्धिक लिपि हैं, जो समस्त गुणों से संपन्न है। केवल भारत की ही नहीं, अपितु विश्व की किसी भी भाषा को देवनागरी लिपि के माध्यम से सहजता से लिखा जा सकता है।



अध्यक्षीय वक्ता के रूप में आदरणीय ब्रजकिशोर शर्मा जी ने डॉ शहाबुद्दीन शेख को बधाई देते हुए कहा  कि उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है| आपने कहा कि वे एक अच्छे इंसान तो है ही, पर शिक्षा के माध्यम से आपने राष्ट्र की अप्रतिम सेवा की है। श्री शर्मा ने कहा कि देवनागरी लिपि निरंतर विकासशील रही है सारी लिपियों के मध्य देवनागरी में अनेक विशेषताएं हैं।



कार्यक्रम में डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख के जन्म दिवस पर उपस्थित जनों ने उन्हें बधाई दी। अतिथि श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉक्टर शंभू पंवार, झुंझुनू, श्री राकेश छोकर,  नई दिल्ली, डॉ भरत शेणकर, अहमदनगर, डॉक्टर रोहिणी डाबरे, अहमदनगर, शिवा लोहारिया, जयपुर, श्री हरेराम वाजपेयी, डॉ सुषमा कोंडे आदि ने डॉ शेख के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला।




अतिथि परिचय एवं संस्था परिचय महासचिव डॉक्टर प्रभु चौधरी ने दिया। उन्होंने कहा कि देवनागरी लिपि विश्व लिपि है। इसके प्रचार के लिए निरंतर प्रयास करना होगा।


राष्ट्रीय सचिव गरिमा गर्ग, पंचकूला ने भाषा की महिमा पर कविता सुनाई, जिसकी पंक्तियां थीं, लाइन, बिंदी, मात्राएँ इस भाषा की जान हैं, इन आभूषण से होता भारत का शृंगार है। हिंदी है हमारी भाषा हिंदी हमारी जान है, सभी वेदों का इस भाषा में हुआ बखान है। 


संगोष्ठी के प्रारंभ में सरस्वती वंदना साहित्यकार डॉ प्रवीण बाला, पटियाला ने की। स्वागत गीत साहित्यकार डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद एवं बधाई गीत डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर ने प्रस्तुत किया। स्वागत भाषण डॉ डॉ रोहिणी डाबरे, अहमदनगर ने दिया। कार्यक्रम की प्रस्तावना डॉ आशीष नायक, रायपुर ने प्रस्तुत की।  


अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में  संस्था की राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डॉक्टर सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉ लता जोशी, मुंबई, श्री गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी, प्रयागराज, डॉ मुक्ता कौशिक, रायपुर, डॉ आशीष नायक, रायपुर, डॉ शंभू पंवार, झुंझुनू, डॉ पूर्णिमा कौशिक, रायपुर, डॉ राकेश छोकर, नई दिल्ली, डी पी शर्मा, डॉ संगीता पाल, कच्छ, डॉ सुषमा कोंडे, डॉ ममता झा, मुम्बई, डॉ शिवा लोहारिया, जयपुर, डॉ रोहिणी डाबरे, अहमदनगर, श्री पंढरीनाथ शेल्के, श्री मुदस्सिर सैयद, ललिता घोड़के, डॉ मनीषा सिंह, मुंबई, प्रगति बैरागी, मथेसूल जयश्री अर्जुन, जागृति पटेल, मस्तान शाह, प्रवीण बाला, पटियाला, वंदना तिवारी, डॉ भरत शेणकर, अहमदनगर, डॉ अशोक गायकवाड, श्री हरेराम वाजपेयी, इंदौर, श्री अफजल शेख, श्री दत्तात्रेय टिलेकर, डॉ शोभा राणे, डॉ श्वेता पंड्या, डॉ पोपटराव आवटे, डॉ रीता माहेश्वरी, घनश्याम राठौर, नजमा शेख, जिया खान, असीम आरा शेख, डॉ अनुराधा अच्छवान, डॉक्टर मुक्ता यादव, जागृति पाटील, वंदना तिवारी, अलीम शेख आदि सहित अनेक प्रतिभागियों ने भाग लिया।


अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन डॉ रोहिणी डाबरे एवं डॉ भरत शेणकर, अहमदनगर ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ लता जोशी, मुंबई ने किया।

























 



राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना का आयोजन



20201213

कालिदास मीमांसा : पुस्तक समीक्षा - प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा | Kalidas Mimansa : Book Review Prof. Shailendra Kumar Sharma

कालिदास मीमांसा : महाकवि के रचना विश्व पर दृष्टिपूर्ण मंथन

- प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा


संपूर्ण भारतीय साहित्य ही नहीं, विश्व साहित्य में महाकवि कालिदास अद्वितीय रचनाकार के रूप में सुस्थापित हैं। वे अनेक शताब्दियों से देश के असंख्य कवियों को अजस्र प्रेरणा दे रहे हैं। क्या व्यक्ति और परिवार जीवन, क्या समाज जीवन, क्या राष्ट्र जीवन और क्या विश्व जीवन -  महाकवि की दृष्टि से कुछ भी ओझल नहीं है। कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदास: ऐसे ही नहीं कहा गया और उनकी चर्चा के बाद  अनामिका को सार्थक होना ही था। सदियों से उनके साहित्य का मंथन विश्व के अनेक मनीषियों ने अपनी - अपनी दृष्टियों से किया है। इसी शृंखला में महाकवि के विराट रत्नराशिमय साहित्य सागर और काव्य सौंदर्य के अध्ययन - आकलन - विश्लेषण की दिशा में यशस्वी विद्वान पद्मश्री डॉ केशवराव मुसलगाँवकर का ग्रन्थ कालिदास मीमांसा महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बना है। पुस्तक का सुरुचिपूर्ण संपादन उनके सुपुत्र डॉ राजेश्वरशास्त्री मुसलगाँवकर ने किया है। लेखक ने इस बृहद् ग्रंथ के माध्यम से पूरी परम्परा में अनन्य महाकवि के गुणों का अन्वेषण और उसके साहित्य सागर में मग्न होकर बिखरे हुए रत्नों को ढूंढ निकालने का अथक परिश्रम किया है और इसमें वे सफल भी रहे हैं।


                  पुस्तक : कालिदास मीमांसा

लेखक - पद्मश्री डॉ केशवराव मुसलगाँवकर

संपादक – डॉ राजेश्वरशास्त्री मुसलगाँवकर


ग्रन्थ के संपादकीय में डॉ राजेश्वरशास्त्री मुसलगाँवकर ने कालिदास और कालिदासीय काव्य की मीमांसा की जरूरत की ओर सार्थक संकेत किया है -  जो अध्येता काव्य की सतह पर ही संतरण करता है तथा उसके अंतर में पैठने की योग्यता नहीं रखता वह कथमपि अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण निर्वाह नहीं कर सकता। किसी भी कवि कर्म की दृढ़ परीक्षा किए बिना, , मार्मिक मीमांसा किए बिना, किसी काव्य के गुण दोष का पूर्णज्ञान हमें नहीं हो सकता। ….. मीमांसा की भी इसलिए आवश्यकता है कि सामान्य कवि तथा महाकवि के कर्म का अंतर स्पष्टतः ज्ञात हो सके और इसी कार्य के संपादन की योग्यता से व्यक्ति ही आलोचक का गौरवपूर्ण पद प्राप्त कर सकता है। ग्रंथकार पद्मश्री मुसलगांवकर आलोचक की इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरे हैं। 


महाकवि कालिदास की रचना शक्ति के वैशिष्ट्य को कई आलंकारिकों, कवियों और सुभाषितकारों ने विविध रूपों में प्रतिपादित किया है। इस ग्रन्थ के माध्यम से डॉ मुसलगांवकर ने उस महनीय परंपरा से स्वयं को जोड़ते हुए रस, ध्वनि, रीति, अलंकार आदि के महत्त्वपूर्ण उदाहरणों के साक्ष्य पर कालिदास की अनुपम साहित्यिक उपलब्धियों की पड़ताल की है। आचार्य दंडी ने मधुद्रव से लिप्त, महाकवि की निर्विषया वाणी और वैदर्भी रीति की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। ग्रंथकार भी उनके स्वर में स्वर मिलाते हुए कहता है, कालिदास उन महाकवियों में से हैं, जिनकी कोयल के शब्द के समान कर्णेन्द्रिय को सुख देने वाली, रस - अलंकार आदि से युक्त, चमत्कार पैदा करने वाली उक्तियों से अथवा कविता समूहों से विभूषित मुखों में सरस्वती अपनी वीणा बजाती सी सदैव शोभित होती है।


लेखक ने प्रारंभिक अनुच्छेद महाकवित्व कितना सुकर, कितना दुष्कर! के माध्यम से कविता रूपी तपश्चर्या पर खरे उतरे कालिदास के वैशिष्ट्य का हृदयग्राही निरूपण किया है। लेखक ने कालिदास को द्रष्टा और स्रष्टा के रूप में परखा है तो उनके क्रांतिदर्शत्व की भी पड़ताल की है। भारतीय काव्यशास्त्राचार्यों की दृष्टि में कवि के लिए दर्शन और वर्णन दोनों ही अत्यंत आवश्यक गुण हैं। उनका कथन है कि द्रष्टा होने पर भी कोई व्यक्ति तब तक कवि नहीं हो सकता, जब तक वह अपने प्रातिभचक्षु से अनुभूत दर्शन को कमनीय शब्दों में प्रकट नहीं करता। क्योंकि कवि - कर्म में दर्शन और वर्णन दोनों का ही समन्वय रहता है। लेखक ने कालिदास के काव्य से कतिपय उदाहरणों के साक्ष्य पर प्रतिपादित किया है कि अनुरूप अर्थ का अर्थ के अनुरूप शब्द प्रयोग करने की योग्यता महाकवि कालिदास में होने से ही वे आज अखिल विश्व के सहृदय पाठकों के कंठाभरण बने हुए हैं। उनके काव्यों में शब्द और अर्थ दोनों की अन्यूनानतिरिक्त परस्पर स्पर्धापूर्वक मनोहारिणी श्लाघनीय स्थिति देखने को मिलती है। निश्चित ही उस आस्वादमय - रस - भावरूप अर्थतत्व को प्रवाहित करने वाली कालिदास की वाणी उसके अलौकिक, प्रतिभासमान, प्रतिभा (अपूर्ववस्तु निर्माणक्षमा प्रज्ञा) के वैशिष्ट्य को प्रकट करती है। इसीलिए नानाविध कवि परंपराशाली इस संसार में कालिदास आदि दो - तीन अथवा पाँच – छह ही महाकवि गिने जाते हैं। आचार्य आनंदवर्धन के इस हृदयोद्गार का समर्थन लोचनकार आचार्य अभिनव गुप्त ने भी किया है। अभिव्यक्तेन स्फुरता प्रतिभाविशेषेन निमित्तेन  महाकवित्वगणनेति यावत् अर्थात् अभिव्यक्त या स्फुरित होते हुए प्रतिभा - विशेषरूप निमित्त से महाकवित्व की गणना (महाकवियों में गणना) होती है। 


लेखक की दृष्टि में कालिदास के महाकवि होने का एक कारण और है, उनका ऋषि तुल्य क्रांतदर्शित्व। सच्चा कवि क्रांतदर्शी होता है - कवयः क्रांतदर्शिनः। व्यक्तिविवेककार महिमभट्ट के साक्ष्य पर डॉ मुसलगांवकर संकेत करते हैं कि इने गिने भाग्यशालियों की परंपरा में कालिदास को ही पांक्तेय होने का गौरव आज तक प्राप्त है, जिनकी क्रांतिदर्शिता की जड़ें सहस्रों वर्षों की राष्ट्रीय - सांस्कृतिक परंपरा में गहराई तक गई हुई होती हैं और तद्जन्य होने वाली राष्ट्र की समग्रचेतना को अभिव्यक्ति देने की कला पर उनका विलक्षण अधिकार होता है। 


कालिदास के समय को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहा है। लेखक डॉ मुसलगांवकर ने उनका आविर्भाव काल चौथी शताब्दी के उत्तरार्ध या पांचवी शताब्दी के आरंभ को माना है। कालिदास के नाम और उनके जीवन से जुड़े विभिन्न गल्पों की सच्चाई पर भी लेखक ने पर्याप्त मंथन किया है। यहां लेखक का स्पष्ट आग्रह है कि कृती पाठक अन्वेषण करने जैसी बेकार बातों में उलझना नहीं चाहते और नहीं हम उन्हें उलझाना चाहते हैं और हमारे अभीष्ट कवि को भी यह रुचिकर नहीं है। कृतीपाठक को छककर कालिदास की कविता - कामिनी के सौंदर्य - रस का पान कराना चाहते हैं। फिर लेखक ने विक्रमोर्वशीय के पुरूरवा - विदूषक के संवाद के साक्ष्य पर निष्कर्ष निकाला है कि  कालिदास स्वयं कृती को ही धन्य मानते हैं। यहीं पर डॉ मुसलगांवकर ने तत्त्वान्वेषण की विडम्बना से मुक्त होने का आग्रह किया है, कवियों की डांट फटकार के बावजूद दुनिया से तत्त्वान्वेषण का कारोबार बंद नहीं हो गया है, वह आज भी निरंतर गतिशील है। निश्चय ही इससे कवि की अंतरात्मा को कष्ट होता होगा। इसलिए हम भी इस तत्त्वान्वेषण के झगड़े में न पड़कर इतना ही कहना चाहते हैं कि कवि के गुप्तकालीन काव्यों में तरलित होती हुई उसकी प्रतिभा को देखकर भी उसे न पहचानने का कोई बहाना न करें इसी से उसे संतोष होगा। 


ग्रंथ का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय कविता कामिनी के शृंगार पर केंद्रित है। लेखक ने यहाँ ऐसे तमाम विषयों का उल्लेख किया है, जिनका कवि ने अपनी कविता कामिनी के शृंगार के लिए उपयोग किया है। लेखक ने अनेक प्रसंगों के साक्ष्य पर उनकी बहुज्ञता प्रतिपादित की है। उदाहरण के लिए उदात्त आदि स्वरों के उल्लेख, अश्वमेध यज्ञ, अध्यात्मविद्या की ओर प्रवृत्ति से सिद्ध होता है कि कालिदास की व्युत्पत्ति वेद और वेदांग में बड़ी गहरी है। इसी तरह कालिदास स्मृतियों द्वारा प्रस्तुत राजधर्म, योगशास्त्र द्वारा प्रतिपादित ध्यान, आसन आदि, मीमांसाशास्त्रीय न्याय एवं धर्म के वास्तविक स्वरूप के निरूपण में भी निष्णात हैं। यहीं पर लेखक ने अनेकविध उदाहरणों से महाकवि कालिदास की सांख्यशास्त्र, न्याय एवं वैशेषिक दर्शन, गृह्यसूत्र, राजनीतिशास्त्र, कामशास्त्र, नाट्यशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद, सामुद्रिक शास्त्र, संगीत, चित्रकला, इतिहास एवं भूगोल में गति का सविस्तार परिचय दिया है। 


लेखक ने महाकवि की कला सम्बन्धी मान्यताओं का भी सविस्तार निरूपण किया है। लेखक की दृष्टि में महाकवि कालिदास की कला विषयक मान्यताएं त्रिकालाबाधित और सार्वत्रिक मान्यता प्राप्त की हुई हैं। कला सृजन में विनिवेशन, अन्यथाकरण और अन्वयन की महिमा से कालिदास न केवल अवगत थे, वरन उनके लेखन से स्पष्ट संकेत मिलता है कि वे स्वयं बड़े कलानिष्णात थे। इसी प्रकार विभिन्न रचनाओं में भावाभिनिवेश, भावानुप्रवेश और यथालिखितानुभाव जैसे शब्दों का अर्थपूर्ण प्रयोग चित्रकला, नृत्य और अभिनय कला के क्षेत्र में कालिदास की विशेषज्ञता को सिद्ध करता है।


लेखक ने कालिदास की सातों रचनाओं ऋतुसंहार, कुमारसम्भव, मेघदूत, रघुवंश, मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय और शाकुन्तल के वैशिष्ट्य की विशद पड़ताल इस ग्रंथ में की है। इन रचनाओं से जुड़ा हुआ कोई भी महत्वपूर्ण पक्ष लेखक की आंखों से ओझल नहीं है। चाहे ऋतुसंहार में अनुस्यूत महाकवि की मार्मिक निरीक्षण सृष्टि और उज्ज्वल नैसर्गिक प्रतिभा हो, चाहे मेघदूत की कलात्मक चारुता और मेघाच्छन्न प्रकृति के साथ प्राणिमात्र के अद्भुत रहस्यमय सम्बन्धों का अंकन या फिर कुमारसंभव के माध्यम से कालिदास द्वारा अपने जीवन दर्शन को विस्तृत कथा फलक पर अंकित करने का समर्थ प्रयत्न हो अथवा रघुवंश के माध्यम से राग और विराग, भोग और त्याग का संतुलित चित्र अंकित करने का प्रयास – ये सभी पहलू इस ग्रंथ में सहज ही उद्घाटित हो गए हैं। इसी प्रकार ग्रंथकार ने कालिदास की नाट्यत्रयी को उनकी नाट्य कला के क्रमशः विकासमान होने के क्रम में दिखाया है। वे लिखते हैं,  मालविकाग्निमित्रम् में कवि की नाट्यकला का अंकुर प्रस्फुटित होकर विक्रमोर्वशीय में वह पुष्पित होता हुआ अभिज्ञानशाकुंतल में पूर्ण रूप से संस्कृत नाट्यकला के मधुरतम फल के रूप में परिणत हुआ है। तीनों नाटकों की संविधानक रचना, पात्र – स्वभाव चित्रण, रस व्यंजना आदि की गम्भीर विवेचना इस ग्रंथ की उपलब्धि है। 


लेखक की दृष्टि में कालिदास का काव्य उत्तरकालीन सभी काव्यों से, सभी काव्य - क्षेत्रों में, अतिशय (बढ़ा – चढ़ा) है - किं बहुना अतिशेते सर्वमतो विशिष्ट:, इसलिए उनका काव्य विशिष्ट है। एक प्रकार से वे अपने काव्यप्रभाव से उन उत्तरवर्ती कवियों पर शासन करते हैं, इसलिए वे शिष्टकृत् भी हैं - शिष्टं शासनं तत् करोतीति शिष्टकृत्, काव्य कवि की आत्मा से प्रसूत होने से एक प्रकार से वह आत्मजन्मा होता है। (आत्मनो जन्म यस्य) उन दोनों में अभेद होता है। उसका काव्य कवि की चैतन्यमूर्ति होती है। दोनों एकाकार होते हैं। जब वह समाधिस्थ होता है, उसकी चित्तवृत्ति बाह्य विषयों से हटकर अंतर्मुखी हो जाती है। ऐसी दशा में कहां कवि कालिदास और कहां उसका प्रसूत काव्य। द्वैतभावना से मुक्त।


इस ग्रन्थ के माध्यम से लेखक ने स्थान स्थान पर कतिपय विद्वानों की सीमाबद्ध मान्यताओं का भी तर्कपूर्वक खंडन किया है। जैसे एक मान्यता रही है कि कालिदास कवि हैं, नाटककार नहीं। लेखक की दृष्टि में संस्कृत साहित्य का यह शलाका पुरुष मूर्धन्य नाटककार तथा कवि दोनों ही है। इसकी पुष्टि विक्रमोर्वशीय और शाकुंतल में रचित कथावस्तु विनियोग द्वारा हो जाती है। उन्होंने जीवन के गत्यात्मक चित्र का निर्वाह बड़ी कुशलता से किया है। इस दृष्टि से उत्तरकालीन विशाखदत्त नाटककार ही उनके समकक्ष प्रतीत होता है। भवभूति को जिन्होंने दांपत्य जीवन के आदर्श बीज को करुण रस से सींच कर उत्तररामचरित में पल्लवित किया है, नाटकीय दृष्टि से सफल नाटककार नहीं कहा जा सकता। महाकवि कालिदास की एक नाटककार के रूप में सफलता की वजह है कि वे अपने कवित्व के भार से नाटक की कथावस्तु को कहीं भी आक्रांत कर, गतिहीन नहीं करते हैं। विक्रमोर्वशीय के चतुर्थ अंक में अनुस्यूत पुरूरवा की भावात्मक उक्तियाँ भी प्रसंग के अनुरूप ही हैं, क्योंकि वहां पुरूरवा की विक्षिप्त दशा का संकेत देना कवि का अभीष्ट है।

परवर्ती साहित्य पर  महाकवि कालिदास के प्रभाव का भी पर्याप्त निरूपण इस ग्रंथ में किया गया है। भवभूति, हर्ष, राजशेखर, बिल्हण, माघ जैसे अनेक रचनाकारों ने कालिदास के दाय को किसी न किसी रूप में अंगीकार किया है। 


कालिदासीय साहित्य के सूक्ष्म पर्यालोचन के आधार पर लेखक ने संकेत दिया है कि महाकवि  ने अनेक शास्त्रों का अध्ययन तथा विविध विषयों का सूक्ष्म अवलोकन कर व्युत्पन्नता प्राप्त कर ली थी। धर्म, दर्शन, राजतंत्र, शिक्षा, नाट्यकला, चित्रकला आदि अनेक विषयों पर उन्होंने मननपूर्वक तद्विषयक अपने मत को निर्धारित करके अपने ग्रंथों में उनका यथास्थान उपयोग किया है। लेखक ने उनके काव्य में अंतर्निहित समन्वयवादी दृष्टिकोण को अनेक उदाहरणों के साक्ष्य पर स्पष्ट किया है। महाकवि कालिदास के लोकचरित्र, राजा और राजधर्म, यज्ञ कर्म, शिक्षा, व्रत - नियम, प्रसाधन, कहावतों, उक्ति वैचित्र्य आदि अनेक पक्षों की विशद चर्चा ग्रन्थकार ने की है। 


ग्रंथकार ने प्रारंभ में आचार्य श्रीनिवास रथ और डॉ विंध्येश्वरीप्रसाद मिश्र विनय द्वारा प्रणीत महाकवि कालिदास पर केंद्रित दो रचनाओं क्रमशः कालिदास कविता एवं नन्वहं कालिदासो ब्रवीमि को प्ररोचना के रूप में प्रस्तुत किया है, जो महाकवि की महिमा का सरस अनुकीर्तन करती हैं। 


ग्रंथ के अंत में परिशिष्ट में लेखक ने कालिदास के विश्वप्रसिद्ध सुभाषितों का संचयन किया है, जो काव्य रसिकों कालिदास साहित्य के जिज्ञासुओं और शोधकर्ताओं के लिए उपादेय सिद्ध होंगे। 



विगत लगभग छह दशकों से लेखनरत ग्रंथकार डॉ मुसलगांवकर ने अपने पिता और गुरु पं महामहोपाध्याय सदाशिव शास्त्री मुसलगांवकर से व्याकरण, न्याय, धर्मशास्त्र और मीमांसा तथा पं महामहोपाध्याय हरि रामचन्द्र शास्त्री दिवेकर से काव्यशास्त्र का गहन अध्ययन किया था। वे मीमांसकों की परंपरा के समर्थ  संवाहक हैं। उन्होंने तीस से अधिक ग्रंथों का प्रणयन किया है, जिनमें प्रमुख हैं संस्कृत नाट्य मीमांसा - दो खण्डों में, रस मीमांसा, नाट्यशास्त्र पर्यालोचन, आधुनिक संस्कृत काव्य परम्परा, संस्कृत महाकाव्य की परंपरा, कालिदास मीमांसा आदि। इसके साथ ही उन्होंने अनेकानेक टीकाओं और विवेचनात्मक ग्रन्थों से जिज्ञासुजनों और शोधकर्ताओं को महत्त्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध करवाई है। इनमें प्रमुख हैं - शिशुपालवधमहाकाव्यम्, हर्षचरितम्, दशरूपकम्, नैषधीयचरितम्, विक्रमांकदेवचरितम्, रघुवंशम् आदि। उन्होंने प्रसिद्ध विद्वान डॉ वी वी मिराशी कृत ग्रंथ भवभूति का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया है। उनके द्वारा प्रणीत संस्कृत व्याकरण प्रवेशिका का लाभ अनेक विद्यार्थी ले रहे हैं। उनका योगसूत्र पर सविवेचन भाष्य पूर्णता पर है, जिसके 2000 से अधिक पृष्ठ वे हाथ से लिख चुके हैं। इसका प्रकाशन चौखंभा प्रकाशन, वाराणसी से होगा।  उनके यशस्वी सुपुत्र डॉ. राजेश्वर शास्त्री मुसलगांवकर स्वयं अनेक ग्रन्थों के प्रणयनकर्ता और मीमांसक हैं।


समग्रतः डॉ मुसलगांवकर का ग्रंथ कालिदास मीमांसा महाकवि के कृतित्व के विभिन्न पहलुओं को उद्घाटित करने में तो सफल है ही, कई नवीन स्थापनाओं के लिए भी उल्लेखनीय बन पड़ा है। लेखक ने कालिदास को भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों के आलोक में देखा परखा है और उनकी रचनात्मक उपलब्धियों की बहुविध मीमांसा कर एक नई दिशा का भी सन्धान किया है। कालिदास साहित्य के जिज्ञासुओं से लेकर विशेषज्ञों तक सभी इस पुस्तक से लाभन्वित होंगे, ऐसी आशा व्यर्थ नहीं होगी। 


पुस्तक : कालिदास मीमांसा

लेखक : डॉ. केशवराव मुसलगाँवकर 

संपादक : डॉ. राजेश्वरशास्त्री मुसलगाँवकर

प्रकाशक : चौखंबा संस्कृत संस्थान, वाराणसी 

मूल्य :  रुपए 525

पृष्ठ :  324 

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प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा 
आचार्य एवं अध्यक्ष 
हिंदी अध्ययनशाला 
कुलानुशासक 
विक्रम विश्वविद्यालय 
उज्जैन मध्य प्रदेश

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