20170721

कुरंडा की अनन्य अनुभूतियों से जुड़े बिम्ब: ऑस्ट्रेलिया प्रवास की जादुई स्मृतियाँ - दो

ऑस्ट्रेलिया के पूर्वोत्तर तट पर क्वींसलैंड राज्य में कैर्न्स नगर के समीपस्थ कुरंडा एक पहाड़ी गांव है। ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों में एक कुरंडा अपने नैसर्गिक वैभव, आदिम सभ्यता से जुड़े लोगों की संस्कृति, कला रूपों, सुदर्शनीय रेलमार्ग और स्काई रेल की रोमांचक यात्रा के लिए जाना जाता है। ऑस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान कुरंडा से जुड़ी सपनीली यादों के साथ कुछ छायाचित्र यहाँ पेश हैं। 
कुरंडा ऑस्ट्रेलिया में शुरुआती तौर पर बसने वाले लोगों के साथ उष्ण कटिबंधीय वर्षावन की पहाड़ियों पर विकसित होने लगा था। कैर्न्स से मीटर गेज ट्रेन से जाना और लौटने में स्काई रेल की रोमांचकारी सवारी इस यात्रा को अविस्मरणीय बना गए। इस इलाके की प्रमुख नदी बैरोन है। रेल यात्रा के दौरान सम्मोहक बैरोन फॉल्स को निहारने के लिए ट्रेन कुछ देर रुकती है।
कुरंडा में क्वाला और वन्यजीव पार्क 1996 में खोला गया है। यहाँ ऑस्ट्रेलिया की पहचान को निर्धारित करने वाले क्वाला, कंगारू, मगरमच्छ, वेलेबिज, डिंगो, वोम्बेट, कैसॉवरी, छिपकली, मेढक और सांप सहित कई ऑस्ट्रेलियाई मूल के अचरजकारी जीवों को निकट से महसूस करना अनन्य अनुभूति दे गया। 
कुरंडा में अनेक प्रकार का भोजन उपलब्ध है, जो इस क्षेत्र की विविधता को दर्शाता है। दुकानों, कला दीर्घाओं, कैफे और रेस्तरां की दिलचस्प सरणियाँ यहाँ मिलीं, जहाँ से कुछ स्मृति चिह्न भी संचित किए। ऑस्ट्रेलिया के आदि निवासियों, जिन्हें अबोरजिनल कहा जाता है, की कला और सांस्कृतिक विरासत के अवलोकन का यादगार मौका भी इस गाँव में मिला। आदि निवासियों के परिवार से जुड़ा एक युवा एक हाथ में बूमरैंग लिए और दूसरे हाथ में सुषिर वाद्य डिजरीडू (didgeridoo) या डिडजेरिडू बजाते हुए मिला। भारतीय संगीत परम्परा में वायु द्वारा बजाये जाने वाले वाद्य सुषिर वाद्य या वायुवाद्य या फूँक वाद्य कहे जाते हैं, जैसे- बाँसुरी, शंख, तुरही, भूंगल, शहनाई आदि। ऑस्ट्रेलियाई डिजरीडू (didgeridoo) काष्ठ निर्मित वाद्य यंत्र है। डिजरीडू (didgeridoo) ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी समुदाय द्वारा विकसित एक वायुवाद्य है, जिसमें श्वास या वायु द्वारा ध्वनि उत्पन्न की जाती है। अनुमान लगाया जाता है कि इसका विकास उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में पिछले 1500 वर्षों में कभी हुआ था। वाद्य यंत्रों के होर्नबोस्तेल-साक्स वर्गीकरण में यह एक वायुवाद्य है। वैसे तो ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों ने प्रकृति के साथ तादात्म्य लिए तीन वाद्ययंत्र विकसित किए हैं - डिजरीडू (didgeridoo), बुलरोअरर और गम-लीफ। इनमें दुनियाभर में सबसे अच्छी तरह से जाना जाता है  डिजरीडू। यह एक सादी सी लकड़ी की ट्यूब जैसा वाद्य है, जो तुरही की तरह एक वादक के होंठ के साथ मुख मार्ग के नियंत्रणीय अनुनादों से ध्वनिगत लचीलापन हासिल करता है। आधुनिक डिजरीडू प्रायः 1 से 3 मीटर (3 से 10 फ़ुट) लम्बे होते हैं और बेलन या शंकु का आकार रखते हैं। इन पर प्राकृतिक उपादानों से अनुप्राणित बहुत सुंदर अलंकरण किए जाते हैं।
कुरंडा ग्राम की अमिट छाप को सँजोते हुए हम लोगों की कैर्न्स वापसी स्काई रेल के जरिए हुई। स्काई रेल उत्तर क्वींसलैंड के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के माध्यम से 7.5 किमी की दूरी तय करने का एक अनोखा अवसर प्रदान करती है। इसके जरिये दुनिया का अपने ढंग का पहला, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से प्राचीन उष्ण कटिबंधीय वर्षावन को देखने और अनुभव करने का मौका मिलता है।
स्काई रेल 31 अगस्त 1995 को आम जनता के लिए खोला गया था। केबल वे को मूल रूप से 47 गोंडोला के साथ स्थापित किया गया था, जो प्रति घंटा 300 लोगों की क्षमता से युक्त थी। मई 1997 में इसका उन्नयन पूरा हुआ और गोंडोला की कुल संख्या बढ़कर 114 हो गयी। अब यह प्रति घंटे 700 लोगों को क्षमता रखता है। दिसंबर 2013 में, स्काई रेल ने 11 डायमंड व्यू ग्लास फर्श गोंडोला की शुरुआत की, जिसमें 5 लोगों की सीट है और नीचे के रेन फोरेस्ट के अवलोकन का एक और अद्भुत परिप्रेक्ष्य सामने आया है। कुरंडा नेशनल पार्क और  बैरोन गोर्ज नेशनल पार्क विश्व विरासत में शामिल किए गए ऑस्ट्रेलियाई वर्षा वन के अंग हैं। इनके संरक्षण के लिए अपनाई गई रीतियों से दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है।




20170712

गजानन माधव मुक्तिबोध: एक रूपक

गजानन माधव मुक्तिबोध: एक रूपक
आलेख प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
Prof Shailendrakumar Sharma

गजानन माधव मुक्तिबोध के जन्मशती वर्ष पर आकाशवाणी के लिए तैयार किये गए विशेष रूपक का वीडियो रूपांतर यूट्यूब पर प्रस्तुत किया गया है। आकाशवाणी से प्रसारित इस रूपक का आलेख प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा का है।
साक्षात्कार: प्रो चंद्रकांत देवताले, प्रो प्रमोद त्रिवेदी, प्रो राजेन्द्र मिश्र, प्रो सरोज कुमार।
प्रस्तुति: सुधा शर्मा एवं जयंत पटेल।
वीडियो रूपान्तरण: प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा।
आभार: आकाशवाणी।
इस रूपक का वीडियो रूपांतर को यूट्यूब पर देखा जा सकता है: 
https://youtu.be/jkY6V3eZHa0

आधुनिक हिंदी कविता को कई स्तरों पर समृद्ध करते हुए नया मोड़ देने वाले रचनाकारों में गजानन माधव मुक्तिबोध का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। जन्मशताब्दी वर्ष पर मुक्तिबोध पर केंद्रित रूपक का प्रसारण आकाशवाणी, दिल्ली से  साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य भारती’ में हुआ था। इस रेडियो फ़ीचर का लेखन समालोचक एवं विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने किया है। रूपक में मुक्तिबोध के योगदान और रचनाओं के साथ उन पर केंद्रित वरिष्ठ साहित्यकारों के साक्षात्कार भी समाहित किए गए हैं। इनमें वरिष्ठ कवि प्रो चंद्रकांत देवताले, डॉ. प्रमोद त्रिवेदी (उज्जैन), प्रो राजेन्द्र मिश्र और सरोज कुमार (इंदौर) शामिल हैं।
मुक्तिबोध का जन्म 13 नवम्बर 1917 को मध्य प्रदेश के श्योपुर कस्बे में हुआ था। उन्होंने स्कूली शिक्षा उज्जैन में रहकर प्राप्त की। 1935 में उज्जैन के माधव कॉलेज में पढ़ते हुए साहित्य लेखन आरंभ हुआ। उनकी आरंभिक कविताएँ माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा संपादित ‘कर्मवीर’ सहित कई साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। उन्होंने बी. ए. की पढ़ाई इन्दौर के होल्कर कॉलेज से की थी। उनकी अधिकांश रचनाएँ 11 सितम्बर 1964 को निधन के बाद ही प्रकाशित हो सकीं। उनके कविता संग्रह हैं चांद का मुँह टेढ़ा है और भूरी भूरी खाक धूल, कहानी संग्रह हैं काठ का सपना, सतह से उठता आदमी तथा उपन्यास विपात्र भी चर्चित रहा है। उनकी आलोचना कृतियाँ में प्रमुख हैं- कामायनी: एक पुनर्विचार, नयी कविता का आत्मसंघर्ष, नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ, एक साहित्यिक की डायरी। उनकी सभी रचनाएं 1980 में छह खंडों में प्रकाशित मुक्तिबोध रचनावली में संकलित हैं। मुक्तिबोध का सही मूल्यांकन उनके निधन बाद ही संभव हो पाया, लेकिन उनकी कविताएँ और विचार निरन्तर प्रेरणा देते आ रहे हैं।