20180125

जीवनानुभवों की संक्षिप्त - सुगठित, किन्तु तीक्ष्ण अभिव्यक्ति है लघुकथा : प्रो. डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा

समालोचक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा से सन्तोष सुपेकर का साक्षात्कार


(समीक्षक, निबंधकार और लोक संस्कृतिविद् डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा का जन्म भारत के प्रमुख सांस्कृतिक नगर उज्जैन में हुआ। उच्च शिक्षा देश के प्रतिष्ठित विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से प्राप्त की। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए डा शर्मा ने अनेक नवाचारी उपक्रम किए हैं, जिनमें विश्व हिंदी संग्रहालय एवं अभिलेखन केंद्र, मालवी लोक साहित्य एवं संस्कृति केन्द्र तथा भारतीय जनजातीय साहित्य एवं संस्कृति केन्द्र की संकल्पना एवं स्थापना प्रमुख हैं। तीन दशकों से आलोचना, निबंध-लेखन, नाटक तथा रंगमंच समीक्षा, लोकसाहित्य एवं संस्कृति के विमर्श, राजभाषा हिन्दी एवं देवनागरी के विविध पक्षों पर अनुसंधान एवं लेखन कार्य में निरंतर सक्रिय प्रो शर्मा ने तीस से अधिक ग्रन्थों का लेखन एवं सम्पादन किया है। शोध स्तरीय पत्रिकाओं और ग्रन्थों में आपके 300 से अधिक शोध एवं समीक्षा निबंधों एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 800 से अधिक कला एवं रंगकर्म समीक्षाओं का प्रकाशन हुआ है।  डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा जाने-माने समीक्षक एवं लघुकथा के अध्येता हैं। सम्प्रति विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिन्दी विभाग के आचार्य, हिन्दी अध्ययन बोर्ड के चेयरमेन एवं कुलानुशासक के रूप में कार्यरत हैं।  प्रस्तुत है, लघुकथाकार और कवि संतोष सुपेकर द्वारा लघुकथा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनसे की गई बातचीत।) 

प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा
Prof. Shailendrakumar Sharma






सन्तोष सुपेकर Santosh Supekar



संतोष सुपेकर : सहस्रों वर्ष लम्बी लघुकथा परम्परा में इस विधा की शर्तें कमोबेश तय हो चुकने के बावजूद, डॉ. गोपाल राय द्वारा लिखित ‘हिन्दी कहानी का इतिहास’ में लघुकथा को कथा-साहित्य के नौ पदों में से एक स्वीकारने जैसी उपलब्धि के बाद भी एक विधा के रूप में लघुकथा को स्थान देने या न देने के प्रश्न क्यों उठते रहते हैं?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  लघुकथा एक स्वतंत्र और स्वायत्त विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हमारे वृहत् जीवनानुभवों की संक्षिप्त, सुगठित किन्तु तीक्ष्ण अभिव्यक्ति का नाम लघुकथा है। यह वर्णन या विवरण के बजाय संश्लेषण में विश्वास करने वाली साहित्यिक विधा है, जिसकी परिणति प्रायः विस्फोटक होती है। बीसवीं सदी के अंत तक आते-आते इस विधा ने नए-नए अनुभव क्षेत्रों और अभिव्यक्तिगत आयामों को छूते हुए अपनी विलक्षण पहचान बना ली है। शैलीगत परिमार्जन के बाद लघुकथा का स्वरूप अब और अधिक स्पष्ट और सुसंयत होता जा रहा है। ऐसे दौर में लघुकथाकारों का दायित्व भी बढ़ा है। उन्हें लघुकथा परम्परा में आए बदलावों को लक्षित कर अपनी पहचान बनानी होगी। इसके साथ सम्पादकों का भी दायित्व बनता है कि वे उन्हीं लघुकथाओं को स्थान दें, जो इसकी परम्परा को समृद्ध करती हैं। अन्यथा कमजोर लघुकथाओं के लेखन/प्रकाशन से यह प्रश्न बारम्बार उभरता रहेगा कि इसे स्वतंत्र विधा माना जाये या नहीं? कभी बिहारी के दोहों  के लिए कहा गया था, ‘‘सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर।’’ यह बात आज की लघुकथाओं पर खरी उतर रही है। इसे शुभ संकेत माना जा सकता है।

संतोष सुपेकर : ‘लघुकथा’ शब्द का नामकरण कब और कैसे हुआ? बीसवीं सदी के प्रारंभ में लिखी गईं लघुकथाएँ क्या ‘लघुकथा’ नाम से ही प्रकाशित होती थीं?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  दृष्टांत, नीति या बोध कथा के रूप में लघुकथाओं का सृजन अनेक शताब्दियों से होता आ रहा है। मूलतः दृष्टांतों के रूप में लघुकथाएँ विकसित हुईं। इस प्रकार के दृष्टांत नैतिक और धार्मिक दोनों क्षेत्रों में प्राप्त होते हैं। नैतिकतापरक लघुकथाओं में हम पंचतंत्र, हितोपदेश, महाभारत, बाइबिल, जातक, ईसप आदि की कथाओं को रख सकते हैं। इसी प्रकार धार्मिक दृष्टांतों के रूप में भी देश-विदेश में लघुकथाओं के अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। इधर आधुनिक युग में ‘लघुकथा’ नामकरण काफी बिलंब से हुआ है, किन्तु यह तय बात है कि इस नए अवतार में लघुकथा ने शताब्दियों की यात्रा दशकों में तय कर ली है।
‘लघुकथा’ शब्द मूल रूप में अंग्रेजी के ‘शार्ट स्टोरी’ का सीधा अनुवाद है, किन्तु इसके तौल का एक और शब्द ‘कहानी’ हिन्दी में रूढ़ हो चुका है। इधर कहानी और लघुकथा- दोनों अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। लघुकथा को कहानी का सार या संक्षिप्त रूप मानना उचित नहीं होगा। लघुकथा बनावट और बुनावट में कहानी से अपना स्वतंत्र अस्तित्व और महत्व रखती है। आधुनिक काल में हिन्दी लघुकथा की शुरूआत सन् 1900 के आसपास मानी जा सकती है। माखनलाल चतुर्वेदी की ‘बिल्ली और बुखार’ को पहली लघुकथा माना जा सकता है। इस शृंखला में माधवराव सप्रे, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद से लेकर जैनेन्द्र, अज्ञेय तक कई महत्वपूर्ण नाम जुड़ते चले गए। प्रेमचंद ने अपने सृजन के उत्कर्ष काल में कई लघुकथाएँ लिखीं, जैसे नशा, मनोवृत्ति, दो सखियाँ, जादू आदि। प्रसाद की गुदड़ी के लाल, अघोरी का मोह, करुणा की विजय, प्रलय, प्रतिमा, दुखिया, कलावती की शिक्षा आदि लघुकथा के अनूठे उदाहरण हैं। बंगला साहित्य में भी टैगोर, बनफूल ने महत्वपूर्ण लघुकथाएँ रचीं हैं। हिन्दी में सुदर्शन, रावी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, रांगेय राघव आदि ने मार्मिक लघुकथाएँ लिखीं। बाद में इस धारा में कई और नाम जुड़ते चले गए-उपेन्द्रनाथ अश्क, हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी, नरेन्द्र कोहली, लक्ष्मीकान्त वैष्णव, संजीव, शंकर पुणताम्बेकर, बलराम, डॉ. सतीशराज पुष्करणा, डॉ. सतीश दुबे, सतीश राठी, जगदीश कश्यप, डॉ. बलराम अग्रवाल, डॉ. कृष्ण कमलेश, चित्रा मुद्गल, कमल गुप्त, विक्रम सोनी, भगीरथ, युगल, रमेश बतरा, डॉ. श्यामसुंदर व्यास, पारस दासोत, सूर्यकांत नागर, कमल चोपड़ा,  कुमार नरेंद्र, सुकेश साहनी, अशोक भाटिया, माधव नागदा, मधुदीप गुप्ता, योगराज प्रभाकर, सन्तोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर ‘निरंतर’, मीरा जैन आदि। हाल के दौर में सुधी कथाकार मधुदीप ने लघुकथा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उनके संयोजन-सम्पादन में लघुकथा के सृजन-आलोचन की अविराम शृंखला पड़ाव और पड़ताल अनेक खण्डों में और प्रमुख लघुकथाकारों के प्रतिनिधि संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। इसमें मुझे भी एक समीक्षक के रूप में सहभागी  बनने का अवसर मिला है।  
शुरुआती दौर में लघुकथा जैसी स्वतंत्र संज्ञा अस्तित्व में नहीं आई थी, धीरे-धीरे यह संज्ञा ‘कहानी’ से बिलगाव बताने के लिए प्रचलित और स्थापित हुई है। कुछ लोगों ने ‘लघुकथा’ के अतिरिक्त नई संज्ञाएं या विशेषण देने की भी कोशिश की, जैसे मिनी कहानी, मिनीकथा, कथिका, अणुकथा, कणिका, त्वरितकथा, लघुव्यंग्य आदि; लेकिन ये संज्ञाएँ पानी के बुलबुले के समान बहुत कम समय में निस्तेज हो गईं।

संतोष सुपेकर : आपने कहीं कहा है कि अतिशय स्पष्टीकरण लघुकथा की मारक क्षमता को कम करता है। अपने इस कथन के संदर्भ में लघुकथा के आकार पर प्रकाश डालें। यह भी बताएँ कि क्या रचना का कुछ भाग, जो लेखक कहना चाहता है, पाठक को सोचने के लिए छोड़ दिया जाए, अलिखित?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  निश्चय ही मितकथन लघुकथा की अपनी मौलिक पहचान है। अतिशय स्पष्टीकरण या वर्णन के लिए लघुकथा में अवकाश नहीं है। आकार की दृष्टि से लघुकथा को शब्द या पृष्ठों की गणना में बाँधना संभव नहीं है। अनुभूति की सघनता, शब्दों की मितव्ययता, सुगठित बनावट और लघुता-इसे विलक्षण बनाती है। वैसे तो लघुकथा के लिए कोई सुनिश्चित फार्मूला बनाना इसके साथ अन्याय होगा, फिर भी यह तय बात है कि रचना का कुछ भाग, जो लेखक कहना चाहता है, पाठक के लिए छोड़ दिया जाए तो बेहतर होगा।

संतोष सुपेकर : ऐसा कहा गया है कि लघुकथा का शीर्षक तो दूर पहाड़ी पर बने मंदिर के समान होना चाहिए। इस संदर्भ में लघुकथा में शीर्षक की भूमिका पर अपने विचार बताएँ। 

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  किसी भी अन्य विधा की तुलना में लघुकथा के शीर्षक की अपनी विलक्षण भूमिका होती है। कहीं यह उसके मूल मर्म को संप्रेषित करता है, तो कहीं उसके संदेश को। कहीं वह अप्रत्यक्ष रूप से लघुकथा के कथ्य का विस्तार करता है। इसका शीर्षक देना अपने आप में चुनौती भरा काम है। इसमें सर्जक से अतिरिक्त श्रम की अपेक्षा होती है।

संतोष सुपेकर : एक कथ्य, जो लघुकथा में माध्यम बनता है, कहानी में अपना प्रभाव खो देता है, आप क्या कहना चाहेंगे?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  निश्चय ही किसी भी विधा या रूप का रचाव कथ्य की जरूरतों पर निर्भर करता है। इसलिए जो कथ्य लघुकथा के अनुरूप होता है, वह कहानी या किसी भी दूसरी विधा में जाकर अपना प्रभाव खो देगा।

संतोष सुपेकर : प्रेमचंद के अनुसार अतियथार्थवाद निराशा को जन्म देता है। आज की लघुकथाओं में छाया अतियथार्थवाद क्या पाठक को निराश कर रहा है?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  आज की लघुकथाएँ हमारे वैविध्यपूर्ण जीवनानुभवों को मूर्त कर रही हैं। आज का पाठक सभी प्रकार की लघुकथाओं से गुजरते हुए अपनी संवेदनाओं का विकास करता है। केवल निराश होने जैसी कोई बात नहीं है। 

संतोष सुपेकर : डॉ. कमल किशोर गोयनका के अनुसार लघुकथा एक लेखकहीन विधा है। क्या लघुकथाकार को हमेशा रचना में अनुपस्थित ही होना चाहिए? 

शैलेंद्रकुमार शर्मा : लघुकथा को लेखकहीन विधा कहना उचित नहीं है। एक ही कथ्य को लघुकथा में दर्ज करने का हर लेखक का अपना ढंग होता है। श्रेष्ठ लघुकथाओं में लेखक की उपस्थिति सहज ही महसूस की जा सकती है।

संतोष सुपेकर : फ्लैश/कौंध रचनाओं (चौंकाने वाली) को कुछ विद्वान अगंभीर लघुकथा लेखन मानते हैं, जबकि कुछ इसके पक्ष में हैं। हरिशंकर परसाईं ने एक साक्षात्कार में कहा था कि लघुकथा में चरम बिंदु का महत्व होना ही चाहिए, आपकी राय?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  चौंकाने वाली लघुकथाएँ भी समकालीन लघुकथा लेखन को एक खास पहचान देती हैं। इन्हें अगंभीर लेखन मानना उचित नहीं है। लघुकथा में चरम या समापन बिन्दु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे लघुकथा का निहितार्थ असरदार ढंग से पाठक तक पहुँचता है।

संतोष सुपेकर : लघुकथा में क्या पद्यात्मक पंक्तियों की गुंजाइश है? ऐसी आवश्यकता महसूस हो तो लेखक क्या करे?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  लेखकीय आवश्यकता के अनुरूप या अन्य प्रकार के प्रयोगों के लिए लघुकथा में पर्याप्त गुंजाइश है। ये सारे प्रयोग अंततः लघुकथा की सम्प्रेषणीयता में साधन ही बन सकते हैं, यही इनकी सार्थकता है।

संतोष सुपेकर : लघुकथा को और सशक्त होने के लिए क्या आवश्यक मानते हैं- संकलनों का प्रकाशन, समीक्षा गोष्ठियों, लघुकथा सम्मेलनों का आयोजन, रचनात्मक आन्दोलन या कुछ और?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  वर्तमान दौर में लघुकथाएँ बड़े पैमाने पर लिखी जा रही हैं। कुछ रचनाकार इसे बेहद आसान रास्ते के रूप में चुन रहे हैं। इसीलिए कई ऐसी रचनाएँ भी आ रही हैं, जिन्हें लघुकथा कहना उचित नहीं लगता है। वे महज हास-परिहासनुमा संवाद या किस्सों से आगे नहीं बढ़ पाती हैं। इसलिए जरूरी है कि लघुकथा सृजन की कार्यशालाएँ समय-समय पर आयोजित हों, जहाँ इस विधा से जुड़े वरिष्ठ सर्जक और विद्वान भी जुटें। श्रेष्ठ रचनात्मकता के लिए महज आंदोलनधर्मिता से कुछ नहीं  हो सकता है। इसके लिए गंभीर प्रयास जरूरी हैं। लघुकथा कार्यशाला, परिसंवाद, समीक्षा गोष्ठी, सम्मेलन और प्रकाशन-इन सभी की सार्थक भूमिका हो तो बात बने।

संतोष सुपेकर : कथ्य चयन, कथ्य विकास तथा भाषा-शैली क्या कहानी की तुलना में लघुकथा में अतिरिक्त सावधानी की माँग करते हैं?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  कथ्य चयन, उसका विकास और अभिव्यक्ति के उपादान-सभी दृष्टियों से लघुकथा क्षणों में बँटे जीवन के कोमल और खुरदरे यथार्थ की निर्लेप और संक्षिप्त अभिव्यक्ति होती है। इसलिए थोड़े में बहुत कहने की जिम्मेदारी एक लघुकथाकार की होती है। कहानीकार इससे मुक्त हो सकता है, लघुकथाकार नहीं।

संतोष सुपेकर : श्रेष्ठ विधा वही है जो कागज पर खत्म होने के बाद पाठक के मस्तिष्क में प्रारम्भ हो और उसे सोचने के लिए विवश करे। इस कथन के मद्देनजर विषयवस्तु का दोहराव क्या लघुकथा के विकास में बाधक बन रहा है?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  निश्चय ही लघुकथा के सामने एक बड़ी चुनौती उसके दीर्घकालीन और सघन प्रभाव से जुड़ी हुई है। लघुकथाकारों को अपने अनुभव क्षेत्र को विस्तार देते हुए सृजनरत रहना चाहिए अन्यथा विषयवस्तु का दोहराव लघुकथा के विकास में बाधक बना रहेगा।

संतोष सुपेकर : हिंदी लघुकथा के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  किसी भी अन्य विधा की तुलना में लघुकथा का भविष्य अधिक उज्ज्वल है। समय के अभाव और जनसंचार माध्यमों के अकल्पनीय विस्तार के बीच लघुकथा के लिए पर्याप्त स्पेस अब भी बना हुआ है। इस स्पेस को पहचानकर लघुकथाकार उसका बेहतर उपयोग करेंगे, ऐसी आशा व्यर्थ न होगी। 

संतोष सुपेकर : प्रतीकात्मक लघुकथाओं पर अपने विचार बताएँ?

शैलेंद्रकुमार शर्मा : लघुकथाओं में प्रतीकों की विशिष्ट भूमिका होती है। सार्थक प्रतीक-प्रयोग से रचनाकार अपनी रचना को देशकाल के कैनवास पर वृहत्तर परिप्रेक्ष्य दे सकता है।

-प्रो. डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवं कुलानुशासक, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन-456010 (म.प्र.)
-संतोष सुपेकर, 31, सुदामा नगर, उज्जैन (म.प्र.)

(यह साक्षात्कार लघुकथाकार श्री उमेश महादोषी के संपादन में प्रकाशित अविराम साहित्यिकी के लघुकथा विशेषांक के लिए लिया गया था, जिसके अतिथि संपादक सुधी साहित्यकार श्री बलराम अग्रवाल थे।)

20171221

चंद्रकांत देवताले: जीवन की साधारणता के असाधारण कवि

        जीवन की साधारणता के असाधारण कवि 


प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा 

साठोत्तरी हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में सुविख्यात श्री चंद्रकांत देवताले अब हमारे बीच नहीं रहे, सहसा विश्वास नहीं होता। नई कविता के फार्मूलाबद्ध होने के बाद उन्होंने अपना अलग काव्य मुहावरा गढ़ा था। पिछली सदी के महानतम कवि मुक्तिबोध पर उन्होंने न केवल महत्त्वपूर्ण शोध किया था, वरन उनकी कविताओं की पृष्ठभूमि पर खड़े होकर तेजी से बदलते समय और समाज की पड़ताल भी गहरी रचनात्मकता के साथ की। उनकी कविताएँ जहाँ माँ, पिता, औरत, पेड़, बारिश और आसपास के आम इंसान को बड़ी सहजता, किन्तु नए अंदाज से दिखाती हैं तो भयावह होती सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों को तीखेपन के साथ उजागर भी करती हैं। मेहनतकश जनता और निम्न वर्ग सदैव उनके दृष्टिपथ में रहे, जिनके असमाप्त अहसान को वे आपाद मस्तक स्वीकार करते हैं। उन्होंने लिखा है, 

‘जो नहीं होते धरती पर

अन्न उगाने, पत्थर तोड़ने वाले अपने

तो मेरी क्या बिसात जो मैं बन जाता आदमी।‘ 

Chandrkant Dewtale by Prabhu Joshi व्यक्ति चित्र: श्री प्रभु जोशी 

संवेदनविहीन व्यवस्था और प्रजातन्त्र की विद्रूपताओं के बीच असमाप्त संघर्ष के साथ जीवन यापन करते आम आदमी की पीड़ा उनमें पैबस्त थी। इसीलिए वे प्रेम और ताप को बचाए रखने की चिंता करते रहे,

‘ अगर नींद नहीं आ रही हो तो

हँसो थोड़ा, झाँको शब्दों के भीतर

खून की जाँच करो अपने

कहीं ठंडा तो नहीं हुआ।‘ 

उनकी कविताओं में एक खास किस्म की बेचैनी नजर आती है, जो अमानवीय होते समय और समाज के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया देती है, 

‘पर कौन खींचकर लाएगा

उस निर्धनतम आदमी का फोटू  

सातों समुन्दरों के कंकडों के बीच से

सबसे छोटा-घिसा-पिटा-चपटा कंकड़

यानी वह जिसे बापू ने अंतिम आदमी कहा था।‘

उनकी कविताओं में वैसी ही सादगी, आत्मीयता और आम आदमी के प्रति निष्ठा नज़र आती है, जैसी उनके स्वभाव में थी। साधारणता को उन्होंने अपने जीवन और कविता में सदा बरकरार रखा, जो उनकी असाधारण पहचान का निर्धारक बन गया। वे लिखते हैं, 

‘यदि मेरी कविता साधारण है

तो साधारण लोगों के लिए भी

इसमें बुरा क्या मैं कौन खास

गर्वोक्ति करने जैसा कुछ भी तो नहीं मेरे पास।‘

गम्भीरता को उन्होंने कभी नहीं ओढ़ा। कोई व्यक्ति एक बार भी उनसे मिलता तो उन्हें भूल नहीं सकता था। प्रायः फोन पर वे बड़े गम्भीर अंदाज में अपने समानधर्मा साहित्यकारों से बात की शुरूआत करते, फिर कुछ ऐसी चुटकी लेते कि हँसी का झरना फूट पड़ता था। उज्जैन के साथ उनका एक बार जो सम्बन्ध बना, वह अटूट बना रहा। उनकी कविताओं में उज्जैन और मालवा के अनेक बिम्ब नई भंगिमा के साथ उतरे हैं। राजस्व कॉलोनी स्थित उनका आवास तरह तरह के पेड़ - पौधों के बीच पक्षियों और श्वानों का बसेरा था, जहाँ वे मूक प्राणियों की सेवा में जुटे रहते थे।
देवताले जी का यह कहना उनके काव्य रसिकों के लिए पता नहीं अब कैसे चरितार्थ हो सकेगा,
 ‘मैं आता रहूँगा उजली रातों में
 चंद्रमा को गिटार-सा बजाऊँगा
तुम्हारे लिए।‘

प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
आचार्य एवं कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय
उज्जैन

(देवताले जी का व्यक्ति  चित्र: श्री प्रभु जोशी, विख्यात चित्रकार और साहित्यकार)







(चित्र: प्रो चंद्रकांत देवताले के साथ उज्जैन प्रवास पर आए प्रो टी वी कट्टीमनी एवं प्रो जितेंद्र श्रीवास्तव संग प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा की अंतरंग मुलाकातें)


प्रो चन्द्रकान्त देवताले

आधुनिक हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर श्रीचंद्रकांत देवताले का जन्म 7 नवम्बर 1936 को जौलखेड़ा, जिला बैतूल, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनकी उच्च शिक्षा इंदौर से हुई तथा पीएच.डी. सागर विश्वविद्यालय, सागर से की थी। देवताले जी उच्च शिक्षा में अध्यापन से संबद्ध रहे। देवताले जी की प्रमुख कृतियाँ हैं- हड्डियों में छिपा ज्वर(1973), दीवारों पर ख़ून से (1975); लकड़बग्घा हँस रहा है (1970), रोशनी के मैदान की तरफ़ (1982), भूखण्ड तप रहा है (1982), आग हर चीज में बताई गई थी (1987), पत्थर की बैंच (1996) आदि। वे उज्जैन के शासकीय कालिदास कन्या महाविद्यालय के प्राचार्य एवं प्रेमचंद सृजन पीठ, उज्जैन के निदेशक भी रहे। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में वे उज्जैन में साहित्य साधना कर रहे थे। उनका निधन 14 अगस्त 2017 को दिल्ली में लंबे उपचार के बाद हुआ। 

देवताले जी को उनकी रचनाओं के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें प्रमुख हैं- कविता समय सम्मान -2011, पहल सम्मान -2002, भवभूति अलंकरण -2003, शिखर सम्मान -1986, माखन लाल चतुर्वेदी कविता पुरस्कार, सृजन भारती सम्मान आदि। उन्हें कविता संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूं' के लिए वर्ष 2012 में प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से अलंकृत किया गया था। उनकी कविताओं के अनुवाद प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में और कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं। 

देवताले जी की कविता में समय और सन्दर्भ के साथ ताल्लुकात रखने वाली सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक प्रवृत्तियाँ समा गई हैं। उनकी कविता में समय के सरोकार हैं, समाज के सरोकार हैं, आधुनिकता के आगामी वर्षों की सभी सर्जनात्मक प्रवृत्तियां उनमें हैं। उत्तर आधुनिकता को भारतीय साहित्यिक सिद्धांत के रूप में न मानने वालों को भी यह स्वीकार करना पड़ता है कि देवताले जी की कविता में समकालीन समय की सभी प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से आप उत्तरआधुनिकता को मानें या न मानें, ये कविताएँ आधुनिक जागरण के परवर्ती विकास के रूप में रूपायित सामाजिक सांस्कृतिक आयामों को अभिहित करने वाली हैं। देवताले की कविता की जड़ें गाँव-कस्बों और निम्न मध्यवर्ग के जीवन में हैं। उसमें मानव जीवन अपनी विविधता और विडंबनाओं के साथ उपस्थित हुआ है। कवि में जहाँ व्यवस्था की कुरूपता के खिलाफ गुस्सा है, वहीं मानवीय प्रेम-भाव भी है। वह अपनी बात सीधे और मारक ढंग से कहते हैं। कविता की भाषा में अत्यंत पारदर्शिता और एक विरल संगीतात्मकता दिखाई देती है।