20181224

Lagya re Baan Mhare Shabd Gura ra | Sant Ravidas Bhajan | Singer Nandlal Bhat | लाग्या म्हारे बाण शब्द गुरा रा | सन्त रविदास जी का प्रसिद्ध भजन |https://youtu.be/4NC0GAU3IOo

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20181217

Naurata Dance| Traditional Norata Dance of Bundelkhand| पारम्परिक बुंदेली नौरता नृत्य

Naurata Dance| Traditional Norata Dance of Bundelkhand| पारम्परिक बुंदेली नौरता नृत्य |


 देवी आराधन के लिए बुंदेलखंड का सम्मोहक नोरता नृत्य

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20181205

Shailendra Kumar Sharma Sharma youtube channel Link प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा यूट्यूब चैनल लिंक https://www.youtube.com/c/ShailendrakumarSharma

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Youtube channel for Music, Dance, Drama, Literature, Painting, Folklore & Tribal Culture
Best Folk & Tribal Dances, Songs, Dramas of India: Rajsthan, Madhya Pradesh, Maharashtra, Gujrat, Karnataka, Uttarakhand| M. P.- Malwa, Nimad, Bundelkhand https://www.youtube.com/c/ShailendrakumarSharma  
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लोक नृत्य, संगीत, नाट्य: राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, उत्तराखंड
राजस्थानी लोक नृत्य: घूमर, गवरी, कालबेलिया, कठपुतली, तेरा ताली, भवाई, चरी  
मध्यप्रदेश:
मालवी नृत्य: कानग्वालिया, संजा, भवाई 
मालवा नाट्य माच
निमाड़ी नृत्य: गणगौर
बुंदेलखंडी नृत्य: राई, बधाई
महाराष्ट्र: लावणी, सोंगी मुखौटे
गुजरात: गरबा, सिद्दी धमाल
कर्नाटक: ढोलु कुनिथा
उत्तराखंड: नन्दा राजजात
आदिवासी नृत्य सैला, करमा, गुदुम बाजा
Classical Dance: Kathak, Bharatanatyam 
Mandana मांडना
Kabir Vaani कबीर भजन
Poetry काव्य गायन
Gazal ग़ज़ल 

Presented by
Prof. Shailendra Kumar Sharma
प्रस्तुतकर्ता 
प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा




















































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Madan Mohan Danish|मशहूर शायर श्री मदन मोहन दानिश की लोकप्रिय ग़ज़लें|गुफ्तगू प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा और रश्मि सबा के साथ| 🌼 https://youtu.be/JP4-SmhyApw

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https://youtu.be/JP4-SmhyApw







Raja Bharthari|लोक नाट्य माच- राजा भरतरी|माच गुरु श्री सिद्धेश्वर सेन कृत माच की बाबूलाल देवड़ा चिकलीवाले और समूह की प्रभावकारी प्रस्तुति 🌼 https://youtu.be/KbNLBORAuFA

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https://youtu.be/KbNLBORAuFA


Karma Dance| जनजातीय समुदाय का करमा नृत्य| करमा की सम्मोहक प्रस्तुति| https://youtu.be/8nmYWYLCeXQ

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https://youtu.be/8nmYWYLCeXQ


Sahariya Dance | Swang Dance of Sahariya tribe |सहरिया नृत्य| सहरिया जनजाति का स्वांग नृत्य

Sahariya Dance | Swang Dance of Sahariya tribe |सहरिया नृत्य| सहरिया जनजाति का स्वांग नृत्य  https://youtu.be/yJ8fXRBdyAo




Kathputli Dance|Puppet Show| कठपुतली नृत्य की सुंदर प्रस्तुति|

Kathputli Dance|Puppet Show| कठपुतली नृत्य की सुंदर प्रस्तुति| 




https://youtu.be/W5fS6zvlTQc

Kathak : Aaj Rang hai re|कथक नृत्य: आज रंग है री माँ रंग है री| बनारस घराने के मशहूर कलाकार पं विशाल कृष्ण की मनोहारी नृत्य संरचना|

Kathak : Aaj Rang hai re|कथक नृत्य: आज रंग है री माँ रंग है री| बनारस घराने के मशहूर कलाकार पं विशाल कृष्ण की मनोहारी नृत्य संरचना|

प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा
Prof. Shailendra Kumar Sharma 

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Best Kabir Bhajan|Popular Bhakti Song | Kahat Kabir Suno Bhai Sadho|कबीर वाणी | लोकप्रिय भजन| Best Bhajan Song | Shailendra Kumar Sharma:

Best Kabir Bhajan|Popular Bhakti Song | Kahat Kabir Suno Bhai Sadho|कबीर वाणी | लोकप्रिय भजन| Best Bhajan Song | Shailendra Kumar Sharma:

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20181101

Lavani Dance | लावणी नृत्य | महाराष्ट्र: पारम्परिक लोक नृत्य - संगीत

Lavani Dance | लावणी नृत्य |
महाराष्ट्र: पारम्परिक लोक नृत्य - संगीत|
Presented by Prof. Shailendra Kumar Sharma
https://youtu.be/-Yy7eY5_xs0


Nirgun Chetawani Bhajan || Mat le re Jivda Neend Harami | निर्गुणी चेतावनी भजन|| लोक गायक श्री भंवरनाथ भाटी के स्वर में

निर्गुणी चेतावनी भजन|| लोक गायक श्री भंवरनाथ भाटी के स्वर में ||
Presented by
Prof. Shailendra Kumar Sharma

https://youtu.be/SI_i8TjC1Ik



Ghoomar Dance घूमर नृत्य

घूमर नृत्य||सुमधुर लोक संगीत पर पारम्परिक घूमर|Ghoomar Dance
घूमर नृत्य|Ghoomar Dance
Presented by Prof. Shailendra Kumar Sharma

https://youtu.be/7r2bFmAplMc



20180909

हिंदी के अनेक बोली रूप दुनिया में विकासमान हैं

बारह राज्यों के चालीस से अधिक साहित्यकारों का सम्मान हुआ अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मेलन में 

बोलियों के बिना नहीं है हिंदी का अस्तित्व

राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना एवं नागरी लिपि परिषद के सौजन्य से उज्जैन में राष्ट्रीय साहित्यकार सम्मेलन एवं संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस आयोजन में देश के दस राज्यों के साहित्यकारों और हिंदी सेवियों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि वरिष्ठ कवि डॉ प्रमोद त्रिवेदी एवं सारस्वत अतिथि विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा थे। अध्यक्षता साहित्यकार डॉ हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने की।  
उद्बोधन में डॉ प्रमोद त्रिवेदी ने कहा कि हिंदी का अस्तित्व बोलियों पर टिका हुआ है। उनके बिना हिंदी का अस्तित्व नहीं है। शिक्षा और अनुसंधान कार्यों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए व्यापक प्रयास जरूरी हैं।



प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि विश्वभाषा हिन्दी सही अर्थों में भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की समर्थ संवाहिका है। हिंदी विश्व की निर्मिति में दुनिया के कोने-कोने में डेढ़ सौ से अधिक देशों में बसे भारतीय समुदाय, संस्थाओं और व्यक्तियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। हिंदी के अनेक बोली रूप दुनिया के कोने कोने में विकासमान हैं, जिनमें स्थानीय संस्कृति और बोलियों का जैविक संयोग हो रहा है। हिंदी की नई बोलियाँ विश्व-आँगन से लेकर लोक व्यवहार तक अटखेलियाँ कर रही हैं।
आयोजन के विशिष्ट अतिथि डॉ हरिमोहन धवन, डॉ राजीव पाल, आगरा, डॉ सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉ विद्यासागर मिश्र, लखनऊ थे। प्रारम्भ में स्वागत भाषण एवं कार्यक्रम की संकल्पना पर प्रकाश संस्थाध्यक्ष डॉ प्रभु चौधरी ने डाला। 
समापन समारोह पूर्व कुलपति डॉ मोहन गुप्त के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। उन्होंने कहा कि जो भाषा राजकाज के साथ शिक्षित और अभिजात्य वर्ग द्वारा अपनाई जाती है उसके विकास की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। बोलियां का विकास हो किंतु उन्हें हिंदी से काट कर अलग करना उचित नहीं है। देवनागरी लिपि अत्यंत वैज्ञानिक लिपि के रूप में दुनिया की अनेक भाषाओं को आधार दे रही है। आयोजन के सारस्वत अतिथि नागरी लिपि परिषद के मंत्री डॉ हरिसिंह पाल, वरिष्ठ पत्रकार श्री ओमप्रकाश, नई दिल्ली, समीक्षक डॉ जगदीशचंद्र शर्मा, डॉ विकास दवे, श्री विष्णुप्रसाद चौधरी, श्री मानसिंह चौधरी आदि ने भी विचार व्यक्त किए। 
आयोजन में दो तकनीकी सत्र भी सम्पन्न हुए। ये सत्र सूचना प्रौद्योगिकी एवं देवनागरी लिपि तथा विश्व फलक पर हिंदी: परम्परा और नवीन आयाम पर केंद्रित थे। इन सत्रों में अनेक वक्ताओं ने आलेख प्रस्तुत किए। 



मंचासीन अतिथियों द्वारा चालीस से अधिक साहित्यकारों का सम्मान किया। इनमें शिक्षाविद डॉ बी के शर्मा, कविता भट्ट, श्रीनगर, पूनम गुजराती, सूरत, श्री प्रभु त्रिवेदी, इंदौर, आरतीसिंह एकता, नागपुर, डॉ मीनू पांडेय, भोपाल, सुविधा
 पंडित, अहमदाबाद, तारा परमार, दीपा अग्रवाल, अजमेर, हंसा शुक्ला, दुर्ग, सरिता शुक्ला, लखनऊ, डॉ ज्योति मैवाल, डॉ रूपा भावसार, डॉ तृप्ति नागर, डॉ दीपा व्यास, प्रगति बैरागी, डॉ प्रवीण जोशी, महेश नागर  शामिल थे। 




आयोजन में पत्रिका ट्रू मीडिया, नागरी संगम, विश्वरागिनी आदि का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया।

विभिन्न सत्रों का संचालन सुंदरलाल जोशी, नागदा, सुषमा दुबे इंदौर ने किया। आभार डॉ प्रभु चौधरी एवं डॉ अमृता अवस्थी ने माना। 

20180610

नन्दा राजजात नृत्य और गीतों की सम्मोहनकारी प्रस्तुति: जय बोला इष्ट देवी नन्दा नन्दा कुमाऊँ गढ़वाल की जय बोला https://youtu.be/toww4TD8-ok

नन्दा राजजात नृत्य और गीतों की सम्मोहनकारी प्रस्तुति


जय बोला इष्ट देवी नन्दा नन्दा कुमाऊँ गढ़वाल की जय बोला।
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20180125

जीवनानुभवों की संक्षिप्त - सुगठित, किन्तु तीक्ष्ण अभिव्यक्ति है लघुकथा : प्रो. डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा

समालोचक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा से सन्तोष सुपेकर का साक्षात्कार


प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा
Prof. Shailendrakumar Sharma
(समीक्षक, निबंधकार और लोक संस्कृतिविद् डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा का जन्म भारत के प्रमुख सांस्कृतिक नगर उज्जैन में हुआ। उच्च शिक्षा देश के प्रतिष्ठित विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से प्राप्त की। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए डा शर्मा ने अनेक नवाचारी उपक्रम किए हैं, जिनमें विश्व हिंदी संग्रहालय एवं अभिलेखन केंद्र, मालवी लोक साहित्य एवं संस्कृति केन्द्र तथा भारतीय जनजातीय साहित्य एवं संस्कृति केन्द्र की संकल्पना एवं स्थापना प्रमुख हैं। तीन दशकों से आलोचना, निबंध-लेखन, नाटक तथा रंगमंच समीक्षा, लोकसाहित्य एवं संस्कृति के विमर्श, राजभाषा हिन्दी एवं देवनागरी के विविध पक्षों पर अनुसंधान एवं लेखन कार्य में निरंतर सक्रिय प्रो शर्मा ने तीस से अधिक ग्रन्थों का लेखन एवं सम्पादन किया है। शोध स्तरीय पत्रिकाओं और ग्रन्थों में आपके 300 से अधिक शोध एवं समीक्षा निबंधों एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 800 से अधिक कला एवं रंगकर्म समीक्षाओं का प्रकाशन हुआ है।  डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा जाने-माने समीक्षक एवं लघुकथा के अध्येता हैं। सम्प्रति विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिन्दी विभाग के आचार्य, हिन्दी अध्ययन बोर्ड के चेयरमेन एवं कुलानुशासक के रूप में कार्यरत हैं।  प्रस्तुत है, लघुकथाकार और कवि संतोष सुपेकर द्वारा लघुकथा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनसे की गई बातचीत।) 

 
संतोष सुपेकर : सहस्रों वर्ष लम्बी लघुकथा परम्परा में इस विधा की शर्तें कमोबेश तय हो चुकने के बावजूद, डॉ. गोपाल राय द्वारा लिखित ‘हिन्दी कहानी का इतिहास’ में लघुकथा को कथा-साहित्य के नौ पदों में से एक स्वीकारने जैसी उपलब्धि के बाद भी एक विधा के रूप में लघुकथा को स्थान देने या न देने के प्रश्न क्यों उठते रहते हैं?


शैलेंद्रकुमार शर्मा :  लघुकथा एक स्वतंत्र और स्वायत्त विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हमारे वृहत् जीवनानुभवों की संक्षिप्त, सुगठित किन्तु तीक्ष्ण अभिव्यक्ति का नाम लघुकथा है। यह वर्णन या विवरण के बजाय संश्लेषण में विश्वास करने वाली साहित्यिक विधा है, जिसकी परिणति प्रायः विस्फोटक होती है। बीसवीं सदी के अंत तक आते-आते इस विधा ने नए-नए अनुभव क्षेत्रों और अभिव्यक्तिगत आयामों को छूते हुए अपनी विलक्षण पहचान बना ली है। शैलीगत परिमार्जन के बाद लघुकथा का स्वरूप अब और अधिक स्पष्ट और सुसंयत होता जा रहा है। ऐसे दौर में लघुकथाकारों का दायित्व भी बढ़ा है। उन्हें लघुकथा परम्परा में आए बदलावों को लक्षित कर अपनी पहचान बनानी होगी। इसके साथ सम्पादकों का भी दायित्व बनता है कि वे उन्हीं लघुकथाओं को स्थान दें, जो इसकी परम्परा को समृद्ध करती हैं। अन्यथा कमजोर लघुकथाओं के लेखन/प्रकाशन से यह प्रश्न बारम्बार उभरता रहेगा कि इसे स्वतंत्र विधा माना जाये या नहीं? कभी बिहारी के दोहों  के लिए कहा गया था, ‘‘सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर।’’ यह बात आज की लघुकथाओं पर खरी उतर रही है। इसे शुभ संकेत माना जा सकता है।


सन्तोष सुपेकर Santosh Supekar
संतोष सुपेकर : ‘लघुकथा’ शब्द का नामकरण कब और कैसे हुआ? बीसवीं सदी के प्रारंभ में लिखी गईं लघुकथाएँ क्या ‘लघुकथा’ नाम से ही प्रकाशित होती थीं?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  दृष्टांत, नीति या बोध कथा के रूप में लघुकथाओं का सृजन अनेक शताब्दियों से होता आ रहा है। मूलतः दृष्टांतों के रूप में लघुकथाएँ विकसित हुईं। इस प्रकार के दृष्टांत नैतिक और धार्मिक दोनों क्षेत्रों में प्राप्त होते हैं। नैतिकतापरक लघुकथाओं में हम पंचतंत्र, हितोपदेश, महाभारत, बाइबिल, जातक, ईसप आदि की कथाओं को रख सकते हैं। इसी प्रकार धार्मिक दृष्टांतों के रूप में भी देश-विदेश में लघुकथाओं के अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। इधर आधुनिक युग में ‘लघुकथा’ नामकरण काफी बिलंब से हुआ है, किन्तु यह तय बात है कि इस नए अवतार में लघुकथा ने शताब्दियों की यात्रा दशकों में तय कर ली है।
‘लघुकथा’ शब्द मूल रूप में अंग्रेजी के ‘शार्ट स्टोरी’ का सीधा अनुवाद है, किन्तु इसके तौल का एक और शब्द ‘कहानी’ हिन्दी में रूढ़ हो चुका है। इधर कहानी और लघुकथा- दोनों अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। लघुकथा को कहानी का सार या संक्षिप्त रूप मानना उचित नहीं होगा। लघुकथा बनावट और बुनावट में कहानी से अपना स्वतंत्र अस्तित्व और महत्व रखती है। आधुनिक काल में हिन्दी लघुकथा की शुरूआत सन् 1900 के आसपास मानी जा सकती है। माखनलाल चतुर्वेदी की ‘बिल्ली और बुखार’ को पहली लघुकथा माना जा सकता है। इस शृंखला में माधवराव सप्रे, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद से लेकर जैनेन्द्र, अज्ञेय तक कई महत्वपूर्ण नाम जुड़ते चले गए। प्रेमचंद ने अपने सृजन के उत्कर्ष काल में कई लघुकथाएँ लिखीं, जैसे नशा, मनोवृत्ति, दो सखियाँ, जादू आदि। प्रसाद की गुदड़ी के लाल, अघोरी का मोह, करुणा की विजय, प्रलय, प्रतिमा, दुखिया, कलावती की शिक्षा आदि लघुकथा के अनूठे उदाहरण हैं। बंगला साहित्य में भी टैगोर, बनफूल ने महत्वपूर्ण लघुकथाएँ रचीं हैं। हिन्दी में सुदर्शन, रावी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, रांगेय राघव आदि ने मार्मिक लघुकथाएँ लिखीं। बाद में इस धारा में कई और नाम जुड़ते चले गए-उपेन्द्रनाथ अश्क, हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी, नरेन्द्र कोहली, लक्ष्मीकान्त वैष्णव, संजीव, शंकर पुणताम्बेकर, बलराम, डॉ. सतीशराज पुष्करणा, डॉ. सतीश दुबे, सतीश राठी, जगदीश कश्यप, डॉ. बलराम अग्रवाल, डॉ. कृष्ण कमलेश, चित्रा मुद्गल, कमल गुप्त, विक्रम सोनी, भगीरथ, युगल, रमेश बतरा, डॉ. श्यामसुंदर व्यास, पारस दासोत, सूर्यकांत नागर, कमल चोपड़ा,  कुमार नरेंद्र, सुकेश साहनी, अशोक भाटिया, माधव नागदा, मधुदीप गुप्ता, योगराज प्रभाकर, सन्तोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर ‘निरंतर’, मीरा जैन आदि। हाल के दौर में सुधी कथाकार मधुदीप ने लघुकथा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उनके संयोजन-सम्पादन में लघुकथा के सृजन-आलोचन की अविराम शृंखला पड़ाव और पड़ताल अनेक खण्डों में और प्रमुख लघुकथाकारों के प्रतिनिधि संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। इसमें मुझे भी एक समीक्षक के रूप में सहभागी  बनने का अवसर मिला है।  
शुरुआती दौर में लघुकथा जैसी स्वतंत्र संज्ञा अस्तित्व में नहीं आई थी, धीरे-धीरे यह संज्ञा ‘कहानी’ से बिलगाव बताने के लिए प्रचलित और स्थापित हुई है। कुछ लोगों ने ‘लघुकथा’ के अतिरिक्त नई संज्ञाएं या विशेषण देने की भी कोशिश की, जैसे मिनी कहानी, मिनीकथा, कथिका, अणुकथा, कणिका, त्वरितकथा, लघुव्यंग्य आदि; लेकिन ये संज्ञाएँ पानी के बुलबुले के समान बहुत कम समय में निस्तेज हो गईं।

संतोष सुपेकर : आपने कहीं कहा है कि अतिशय स्पष्टीकरण लघुकथा की मारक क्षमता को कम करता है। अपने इस कथन के संदर्भ में लघुकथा के आकार पर प्रकाश डालें। यह भी बताएँ कि क्या रचना का कुछ भाग, जो लेखक कहना चाहता है, पाठक को सोचने के लिए छोड़ दिया जाए, अलिखित?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  निश्चय ही मितकथन लघुकथा की अपनी मौलिक पहचान है। अतिशय स्पष्टीकरण या वर्णन के लिए लघुकथा में अवकाश नहीं है। आकार की दृष्टि से लघुकथा को शब्द या पृष्ठों की गणना में बाँधना संभव नहीं है। अनुभूति की सघनता, शब्दों की मितव्ययता, सुगठित बनावट और लघुता-इसे विलक्षण बनाती है। वैसे तो लघुकथा के लिए कोई सुनिश्चित फार्मूला बनाना इसके साथ अन्याय होगा, फिर भी यह तय बात है कि रचना का कुछ भाग, जो लेखक कहना चाहता है, पाठक के लिए छोड़ दिया जाए तो बेहतर होगा।

संतोष सुपेकर : ऐसा कहा गया है कि लघुकथा का शीर्षक तो दूर पहाड़ी पर बने मंदिर के समान होना चाहिए। इस संदर्भ में लघुकथा में शीर्षक की भूमिका पर अपने विचार बताएँ। 

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  किसी भी अन्य विधा की तुलना में लघुकथा के शीर्षक की अपनी विलक्षण भूमिका होती है। कहीं यह उसके मूल मर्म को संप्रेषित करता है, तो कहीं उसके संदेश को। कहीं वह अप्रत्यक्ष रूप से लघुकथा के कथ्य का विस्तार करता है। इसका शीर्षक देना अपने आप में चुनौती भरा काम है। इसमें सर्जक से अतिरिक्त श्रम की अपेक्षा होती है।

संतोष सुपेकर : एक कथ्य, जो लघुकथा में माध्यम बनता है, कहानी में अपना प्रभाव खो देता है, आप क्या कहना चाहेंगे?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  निश्चय ही किसी भी विधा या रूप का रचाव कथ्य की जरूरतों पर निर्भर करता है। इसलिए जो कथ्य लघुकथा के अनुरूप होता है, वह कहानी या किसी भी दूसरी विधा में जाकर अपना प्रभाव खो देगा।

संतोष सुपेकर : प्रेमचंद के अनुसार अतियथार्थवाद निराशा को जन्म देता है। आज की लघुकथाओं में छाया अतियथार्थवाद क्या पाठक को निराश कर रहा है?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  आज की लघुकथाएँ हमारे वैविध्यपूर्ण जीवनानुभवों को मूर्त कर रही हैं। आज का पाठक सभी प्रकार की लघुकथाओं से गुजरते हुए अपनी संवेदनाओं का विकास करता है। केवल निराश होने जैसी कोई बात नहीं है। 

संतोष सुपेकर : डॉ. कमल किशोर गोयनका के अनुसार लघुकथा एक लेखकहीन विधा है। क्या लघुकथाकार को हमेशा रचना में अनुपस्थित ही होना चाहिए? 

शैलेंद्रकुमार शर्मा : लघुकथा को लेखकहीन विधा कहना उचित नहीं है। एक ही कथ्य को लघुकथा में दर्ज करने का हर लेखक का अपना ढंग होता है। श्रेष्ठ लघुकथाओं में लेखक की उपस्थिति सहज ही महसूस की जा सकती है।

संतोष सुपेकर : फ्लैश/कौंध रचनाओं (चौंकाने वाली) को कुछ विद्वान अगंभीर लघुकथा लेखन मानते हैं, जबकि कुछ इसके पक्ष में हैं। हरिशंकर परसाईं ने एक साक्षात्कार में कहा था कि लघुकथा में चरम बिंदु का महत्व होना ही चाहिए, आपकी राय?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  चौंकाने वाली लघुकथाएँ भी समकालीन लघुकथा लेखन को एक खास पहचान देती हैं। इन्हें अगंभीर लेखन मानना उचित नहीं है। लघुकथा में चरम या समापन बिन्दु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे लघुकथा का निहितार्थ असरदार ढंग से पाठक तक पहुँचता है।

संतोष सुपेकर : लघुकथा में क्या पद्यात्मक पंक्तियों की गुंजाइश है? ऐसी आवश्यकता महसूस हो तो लेखक क्या करे?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  लेखकीय आवश्यकता के अनुरूप या अन्य प्रकार के प्रयोगों के लिए लघुकथा में पर्याप्त गुंजाइश है। ये सारे प्रयोग अंततः लघुकथा की सम्प्रेषणीयता में साधन ही बन सकते हैं, यही इनकी सार्थकता है।

संतोष सुपेकर : लघुकथा को और सशक्त होने के लिए क्या आवश्यक मानते हैं- संकलनों का प्रकाशन, समीक्षा गोष्ठियों, लघुकथा सम्मेलनों का आयोजन, रचनात्मक आन्दोलन या कुछ और?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  वर्तमान दौर में लघुकथाएँ बड़े पैमाने पर लिखी जा रही हैं। कुछ रचनाकार इसे बेहद आसान रास्ते के रूप में चुन रहे हैं। इसीलिए कई ऐसी रचनाएँ भी आ रही हैं, जिन्हें लघुकथा कहना उचित नहीं लगता है। वे महज हास-परिहासनुमा संवाद या किस्सों से आगे नहीं बढ़ पाती हैं। इसलिए जरूरी है कि लघुकथा सृजन की कार्यशालाएँ समय-समय पर आयोजित हों, जहाँ इस विधा से जुड़े वरिष्ठ सर्जक और विद्वान भी जुटें। श्रेष्ठ रचनात्मकता के लिए महज आंदोलनधर्मिता से कुछ नहीं  हो सकता है। इसके लिए गंभीर प्रयास जरूरी हैं। लघुकथा कार्यशाला, परिसंवाद, समीक्षा गोष्ठी, सम्मेलन और प्रकाशन-इन सभी की सार्थक भूमिका हो तो बात बने।

संतोष सुपेकर : कथ्य चयन, कथ्य विकास तथा भाषा-शैली क्या कहानी की तुलना में लघुकथा में अतिरिक्त सावधानी की माँग करते हैं?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  कथ्य चयन, उसका विकास और अभिव्यक्ति के उपादान-सभी दृष्टियों से लघुकथा क्षणों में बँटे जीवन के कोमल और खुरदरे यथार्थ की निर्लेप और संक्षिप्त अभिव्यक्ति होती है। इसलिए थोड़े में बहुत कहने की जिम्मेदारी एक लघुकथाकार की होती है। कहानीकार इससे मुक्त हो सकता है, लघुकथाकार नहीं।

संतोष सुपेकर : श्रेष्ठ विधा वही है जो कागज पर खत्म होने के बाद पाठक के मस्तिष्क में प्रारम्भ हो और उसे सोचने के लिए विवश करे। इस कथन के मद्देनजर विषयवस्तु का दोहराव क्या लघुकथा के विकास में बाधक बन रहा है?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  निश्चय ही लघुकथा के सामने एक बड़ी चुनौती उसके दीर्घकालीन और सघन प्रभाव से जुड़ी हुई है। लघुकथाकारों को अपने अनुभव क्षेत्र को विस्तार देते हुए सृजनरत रहना चाहिए अन्यथा विषयवस्तु का दोहराव लघुकथा के विकास में बाधक बना रहेगा।

संतोष सुपेकर : हिंदी लघुकथा के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?

शैलेंद्रकुमार शर्मा :  किसी भी अन्य विधा की तुलना में लघुकथा का भविष्य अधिक उज्ज्वल है। समय के अभाव और जनसंचार माध्यमों के अकल्पनीय विस्तार के बीच लघुकथा के लिए पर्याप्त स्पेस अब भी बना हुआ है। इस स्पेस को पहचानकर लघुकथाकार उसका बेहतर उपयोग करेंगे, ऐसी आशा व्यर्थ न होगी। 

संतोष सुपेकर : प्रतीकात्मक लघुकथाओं पर अपने विचार बताएँ?

शैलेंद्रकुमार शर्मा : लघुकथाओं में प्रतीकों की विशिष्ट भूमिका होती है। सार्थक प्रतीक-प्रयोग से रचनाकार अपनी रचना को देशकाल के कैनवास पर वृहत्तर परिप्रेक्ष्य दे सकता है।

-प्रो. डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवं कुलानुशासक, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन-456010 (म.प्र.)
-संतोष सुपेकर, 31, सुदामा नगर, उज्जैन (म.प्र.)

(यह साक्षात्कार लघुकथाकार श्री उमेश महादोषी के संपादन में प्रकाशित अविराम साहित्यिकी के लघुकथा विशेषांक के लिए लिया गया था, जिसके अतिथि संपादक सुधी साहित्यकार श्री बलराम अग्रवाल थे।)