20150819

जीवन की जड़ता और एकरसता को तोड़ती है लोक-संस्कृति

अक्षर वार्ता July 2015: सम्पादकीय
(आवरण: बंसीलाल परमार )
कला-मानविकी-समाज विज्ञान-जनसंचार-विज्ञान-वैचारिकी की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का संपादकीय विविध लोकभिव्यक्तियों के अध्ययन, अनुसन्धान और नवाचार को लेकर सजगता की दरकार करता है।..
लोक-साहित्य और संस्कृति जीवन की अक्षय निधि के स्रोत हैं। इनकी धारा काल-प्रवाह में बाधित भले ही हो जाए, कभी सूखती नहीं है। लोक-कथा, गीत, गाथा, नाट्य, संगीत, चित्र सहित विविध लोकाभिव्यक्तियाँ जीवन की जड़ता और एकरसता को तोड़ती हैं। विकास के नए प्रतिमान एक जैसेपन को बढ़ाते हैं, इसके विपरीत लोक-साहित्य और संस्कृति एक जैसेपन और एकरसता के विरुद्ध हैं। मनुष्य की सजर्नात्मक सम्भावनाएँ साहित्य एवं विविध कला-माध्यमों में प्रतिबिम्बित होती आ रही हैं। इनमें शब्दमयी अभिव्यक्ति का माध्यम ‘साहित्य’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ‘शब्द’ ही मनुष्य की अनन्य पहचान है, जो उसे अन्य प्राणियों से अलग करता है। शब्दार्थ केन्द्रित अभिव्यक्ति के अनेक माध्यमों में से लोक द्वारा रचा गया साहित्य अपनी संवेदना और शिल्प में विशुद्धता और मौलिकता की आंच से युक्त होने के कारण अपना विशिष्ट प्रभाव रचता है, जो कथित आभिजात्य साहित्य द्वारा सम्भव नहीं है। लोक-साहित्य मानव समुदाय की विविधता और बहुलता को गहरी रागात्मकता के साथ प्रकट करता है, वहीं देश-काल की दूरी के परे समस्त मनुष्यों में अंतर्निहित समरसता और ऐक्य को प्रत्यक्ष करता है।
वस्तुतः लोक से परे कुछ भी अस्तित्वमान नहीं है। समस्त लोग ‘लोक’ हैं और इस तरह लोक-संस्कृति से मुक्त कोई भी नहीं है। कोई स्वीकार करे, न करे, उसे पहचाने, न पहचाने,  सभी की अपनी कोई न कोई लोक-संस्कृति होती है। उसका प्रभाव कई बार इतना सूक्ष्म-तरल और अंतर्यामी होता है कि उसे देख-परख पाना बेहद मुश्किल होता है, किन्तु असंभव नहीं। लोक-जीवन में परम्परा और विकास न सिर्फ साथ-साथ अस्तित्वमान रहते हैं, वरन् एक दूसरे पर भी निर्भर करते हैं। लोक-साहित्य और संस्कृति इन दोनों की अन्योन्यक्रिया का जैविक साक्ष्य देते हैं।
लोक-साहित्य सहित लोक की विविधमुखी अभिव्यक्तियों को आधार देती हुई लोक-संस्कृति का स्वरूप अत्यंत व्यापक और विपुलतासम्पन्न है। लोक-साहित्य और संस्कृति तमाम प्रकार के परिवर्तन और विकास के बावजूद अपने अंदर की कई चीजों को बचाये रखते हैं, कभी रूपांतरित करके तो कभी अंतर्लीन करके। सूक्ष्मता से विचार करें तो हमारा सामूहिक मन ऐतिहासिक स्मृतियों, व्यक्तियों और घटनाओं के साथ मानव समूह और क्रियाओं के तादात्म्य को प्रत्यक्ष करता है। यही वह विचारणीय बिंदु है जो लोक-साहित्य, संस्कृति के साथ इतिहास और मानव-शास्त्र का जैविक सम्बन्ध रचता है।
भारत में लोक साहित्य और संस्कृति कथित विकसित सभ्यताओं की तरह भूली हुई विरासत, आदिम या पुरातन नहीं हैं। वे सतत वर्तमान हैं, जीवन का अविभाज्य अंग हैं। भारत के हृदय अंचल मालवा का लोक-साहित्य और विविध परम्पराएँ भी इन्हीं अर्थों में अपने भूगोल और पर्यावरण का अनिवार्य अंग हैं। मालवी लोक-संस्कृति की विलक्षणता के ऐतिहासिक कारण रहे हैं। यह अंचल सहस्राब्दियों से शास्त्र, इतिहास और संस्कृति की अनूठी रंगस्थली रहा है। इनके साथ यहाँ की लोक-संस्कृति की अन्तःक्रिया निरंतर चलती चली आ रही है। यहाँ कभी शास्त्रों ने लोक परम्परा को आधार दिया है तो कभी लोकाचार ने शास्त्र का नियमन किया है, उसको व्यवहार्य बनाया है। यह बात देश के प्रायः अधिकांश भागों की लोक-संस्कृति में देखी-समझी जा सकती है।
लोक में व्याप्त व्रत-पर्व-उत्सवों को कई बार महज धार्मिक अनुष्ठान या रूढ़ि के रूप में देखा जाता है, वस्तुतः ऐसा है नहीं। ये सभी पुराख्यान, इतिहास और जातीय स्मृतियों से जुड़ने और उन्हें दोहराते हुए निरन्तर वर्तमान करने की चेष्टा हैं। उदाहरण के लिए मालवा सहित पश्चिम-मध्य भारत में मनाया जाने वाला संजा पर्व और उससे जुड़ा लोक-साहित्य सही अर्थों में भारतीय इतिहास, जातीय स्मृति, परम्परा और लोक-संस्कृति की आपसदारी का अनुपम दृष्टांत है। फिर यह काल के अविराम प्रवाह से अनछुआ भी नहीं है। इसमें परिवर्तन और विकास की आहटें भी सुनी जा सकती हैं। संजा पर्व में हम देखते हैं कि उसमें चित्रित आकृतियों में शास्त्रोक्त स्वस्तिक (सात्या) और सप्तऋषि तो आते ही हैं, छाबड़ी (डलिया), घेवर, घट्टी जैसे लोक प्रतीकों का भी अंकन होता है। काल-प्रवाह में इससे सम्बद्ध लोक-साहित्य और भित्ति-चित्रों में नए-नए बिम्ब भी संपृक्त होते जा रहे हैं।
जरूरत इस बात की है कि मालवा सहित किसी भी क्षेत्र की लोक-संस्कृति को नितांत बौद्धिक विमर्श से हटकर यहाँ के लोकजीवन के साथ सहज और जैविक अन्तःक्रिया के रूप में देखा-समझा जाए। तभी अध्ययन, शोध और नवाचार में उसके निहितार्थ उजागर होंगे और फिर उसका जीवन और पर्यावरण-बोध हमारे आज और कल के लिए भी कारगर सिद्ध होगा।
वर्तमान में लोक-साहित्य, संस्कृति, इतिहास, समाजशास्त्र और नृतत्त्वशास्त्र के क्षेत्र में नित-नूतन अनुसंधान की संभावनाएं उद्घाटित हो रही हैं। मानव जीवन के इन सचल क्षेत्रों में शोध की अभिनव प्रविधियों को लेकर जागरूकता की दरकार है। तभी हम शोध में स्तरीयता, मौलिकता और गुणवत्ता के प्रादर्श को साकार कर पाएँगे। इस दिशा में आपके रचनात्मक योगदान और प्रतिक्रियाओं का ‘अक्षर वार्ता’ में स्वागत है।
प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
प्रधान संपादक
ई मेल : shailendrasharma1966@gmail.com     डॉ मोहन बैरागी
संपादक
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20150808

इतिहास और लोक-संस्कृति के अन्तः सम्बन्धों की तलाश

अक्षर वार्ता: june 2015 सम्पादकीय
भारत सहित दक्षिण-मध्य एशिया अपने ढंग का विलक्षण भूभाग है, जहां ज्ञान की वाचिक और लिखित- दोनों परम्पराओं का अद्वितीय समन्वय मिलता है। ‘लोके वेदे च’ सूत्र को चरितार्थ करते हुए ये दोनों एक-दूसरे के पूरक बने हुए हैं। लोक-साहित्य और संस्कृति की दृष्टि से भारत की पहचान का उपक्रम उतना ही महत्त्वपूर्ण हो सकता है, जितना लिखित साहित्य की दृष्टि से। आज भारत सहित समूचे एशियाई इतिहास के पुनर्लेखन में लोक साहित्य और संस्कृति के वैज्ञानिक प्रयोग की जरूरत है। भारतीय दृष्टि मानती है कि परिवर्तनशील अतीत में से अपरिवर्तनीय तत्वों का अन्वेषण है- इतिहास। कोई भी अतीत मृत भूतकाल नहीं होता, वह एक सीमा तक वर्तमान में जीवित रहता है। इसी तरह का निरन्तर प्रवहमान अतीत है- लोक-संस्कृति।
नृतत्त्वशास्त्रीय इतिहास की निर्मिति में लोक-संस्कृति का विशेष योगदान रहता है। लोक-संस्कृति के उपादानों के प्रकाश में विभिन्न प्रजातियों के प्रारम्भिक से लेकर परवर्ती दौर तक की भाषा, पुरातत्व और भौतिक जीवन के अध्ययन की दिशा अत्यंत रोचक निष्कर्षों तक पहुँचा सकती है।
वस्तुतः हमारा सामूहिक मन ऐतिहासिक स्मृतियों, व्यक्तियों और घटनाओं के साथ मानव समूह का तादात्म्य है। यही वह बिंदु है जो इतिहास और लोक-संस्कृति का अन्तः सम्बन्ध बनाता है। लोक-संस्कृतिवेत्ता टेफ्ट की मान्यता है कि सभी लोग ‘लोक’ हैं और इस तरह सभी की अपनी लोक-संस्कृति होती है। लोक संस्कृति अत्यंत व्यापक है। इसके अंतर्गत लोगों की कहानियों, घटनाओं, मान्यताओं, रीति-रिवाजों, किंवदंतियों, कथा-गाथा, गीत, संगीत, नृत्य, चिकित्सा, आदि सबका समावेश है। साथ ही यह पूर्व-बसाहट के दिनों, उदाहरण के लिए आरंभिक आखेट, पशुपालन, कृषिकर्म आदि की कहानियों, मूलस्थान के देशों या अन्य क्षेत्रों से प्रत्यारोपित सांस्कृतिक जड़ों की कहानियों को भी समाहित करती है। लोक-संस्कृति से प्राप्त कई तथ्य प्रारंभिक पशुपालन, कृषिकर्म से लेकर घरों की बसाहट, ग्रामों, कस्बों और शहरों तक के विकास का लेखा प्रकट करते हैं। साथ ही सामाजिक संरचना और विविध समुदायों की अंतरक्रियाओं का संकेत भी इनसे प्राप्त होता है।
लोक-संस्कृति और साहित्य आम जन के इतिहास तक हमें ले जाते हैं, जहां आम जन की आशा-हताशा, सुख दुःख, जय-पराजय का रमणीय वृत्तांत होता है। यह आम आदमी की संवेदना का लेखा है। वस्तुतः लोक संवेदना के इतिहास की निर्मिति बिना लोक साहित्य के सम्भव नहीं है। ‘बंगालेर इतिहासेर’ (1966) में प्रो निहार रंजन रे लिखते हैं, जनता का इतिहास लोकविधाओं एवम् लोककर्म आदि से ही निर्मित किया जा सकता है।
यदि अतीत का लेखा-जोखा इतिहास है तो समकाल का लेखा-जोखा पत्रकारिता। इनसे हटकर साहित्य शाश्वत का इतिहास है। वह इनसे आगे ले जाता है। इसलिए लोक-साहित्य इतिहास के लिए उपयोगी है, किन्तु उसमें कितना यथार्थ और कितना कल्पना है, इसकी छानबीन बेहद जरूरी हो जाती है। लोक-साहित्य इतिहास की टूटी कड़ियों को जोड़ने के साथ ही भिन्न दृष्टि से अतीत को देखने का नजरिया भी दे सकता है। वह इतिहास से प्राप्त चरित्रों और घटनाओं के मृत ढाँचे में अस्थि-मांस-मज्जा भरने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
ब्लादिमीर प्रोप ने थ्योरी एंड हिस्ट्री ऑफ़ फोकलोर (1984) में लिखा है, लोक-संस्कृति एक ऐतिहासिक परिघटना है और लोक-संस्कृति का विज्ञान एक ऐतिहासिक अनुशासन है। इस रूप में लोक सांस्कृतिक तत्वों पर गहन और वैज्ञानिक मन्थन आवश्यक हो जाता है। हमारे प्राचीन साहित्य, यथा- जातक कथा, दीघ निकाय, मज्झिम निकाय, खुद्दक निकाय आदि में लोक संस्कृति और परम्परा के कई सूत्र बिखरे हुए हैं, वहीं इतिहास के कई सन्दर्भ उपलब्ध हैं। विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता को लेकर भले ही इतिहास जगत् में विवाद रहा है किन्तु उनसे जुड़े कई तथ्य हमारी समृद्ध लोक परम्परा का अंग बने हुए हैं। यही स्थिति गोरखनाथ, भर्तृहरि, वररुचि, भोज आदि की है। अनुश्रुतियों और लोक-साहित्य में उपलब्ध इस प्रकार के चरित नायकों से जुड़े कई पक्षों की पड़ताल और इतिहास की कड़ियों से उनका समीकरण जरूरी है।
लोकव्यापी व्रत-पर्व-उत्सव महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, इतिहास और जातीय स्मृतियों से जुड़ने और उन्हें दोहराते हुए निरन्तर वर्तमान करने की चेष्टा हैं। मालवा सहित पश्चिम-मध्य भारत में मनाया जाने वाला संजा पर्व भारतीय इतिहास, जातीय स्मृति और लीक-संस्कृति की आपसदारी का अनुपम उदाहरण है। इसी तरह अनेकानेक लोक देवताओं से सम्बद्ध लोक-साहित्य और संस्कृति भी इसी तथ्य की ओर संकेत करते हैं।
आज इतिहास एवं लोक-संस्कृति के क्षेत्र में शोध की अपार संभावनाएं उद्घाटित हो रही हैं। इन अध्ययन क्षेत्रों में शोध की नवीनतम प्रवृत्तियों को लेकर व्यापक चेतना जाग्रत करने की जरूरत है, तभी हम शोध में गुणवत्ता के प्रादर्श को साकार कर पाएँगे। शोधकर्ताओं और युवाओं से गंभीर प्रयत्नों की अपेक्षा व्यर्थ न होगी। शोध की नवीन दिशाओं में क्रियाशील मनीषियों, शोधकर्ताओं और लेखकों के शोध-आलेखों और सार्थक प्रतिक्रियाओं का सदैव स्वागत रहेगा।
प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
Prof. Shailrndrakumar Sharma
प्रधान संपादक
ई मेल : shailendrasharma1966@gmail.com डॉ मोहन बैरागी
संपादक
ई मेल : aksharwartajournal@gmail.com
अक्षर वार्ता Akshar varta
कला-मानविकी-समाज विज्ञान-जनसंचार-विज्ञान-वैचारिकी की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का यह अंक लोक संस्कृति और इतिहास के अंतः सम्बंधों को लेकर सजगता की दरकार करता है... अंतरराष्ट्रीय संपादक मण्डल
प्रधान सम्पादक-प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा, संपादक-डॉ मोहन बैरागी
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20150806

विराट भारतीय चेतना के रचनाकार मैथिलीशरण गुप्त


विराट भारतीय चेतना के रचनाकार मैथिलीशरण गुप्त

प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

मैथिलीशरण गुप्त विराट भारतीय चेतना के रचनाकार थे। राष्ट्रीय आंदोलन को गति देने में राष्ट्रकवि गुप्त जी की अविस्मरणीय भूमिका रही है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रप्रेम को जगाने के साथ ही अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध प्रतिरोध की ताकत पैदा की। वे आलोचकों के सामने सदैव चुनौती बने रहे, जिन्होंने उन्हें अपने पूर्व निश्चित साँचों में बांधने की कोशिश की। उनकी दृष्टि में भारत केवल भूखंड नहीं है, वह साक्षात परमेश्वर की मूर्ति है। उनके लिए भारत एक भाव का नाम है: 
नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है।
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥
नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।
बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

राष्ट्रीय चेतना को सामाजिक चेतना से अलग करके देखना उचित नहीं है। गुप्त जी ने नारी सशक्तीकरण को भी उतना ही महत्त्व दिया है, जितना राष्ट्रोत्थान को। आज देश को भाषा, धर्म, जाति, संप्रदाय के आधार पर विभाजित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में मैथिलीशरण गुप्त का काव्य हमारा सही मार्गदर्शन करता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने मौलिक चिंतन बंद कर दिया है। गुप्त जी हमें सभी प्रकार से जगाने आए थे। 

(श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति द्वारा इंदौर में आयोजित समारोह में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को याद करते हुए वक्तव्य के अंश और विभिन्न अख़बारों की कटिंग्स के साथ साभार प्रस्तुत हैं।)





                                                 


20150524

यथास्थिति नहीं, परिवर्तन की पक्षधर हैं दिनकर सोनवलकर की कविताएँ


                                 प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा

क्या कोई चलेगा कवि पथ पर: जावरा के दिनकर सोनवलकर मार्ग पर कविमना प्रिय प्रतीक सोनवलकर के साथ यादगार छबि... दिनकर सोनवलकर स्मृति समारोह- 24 मई 2015 पर। कविता एक अन्वेषण में उन्होंने लिखा है-
कविता
कोई लबादा तो नहीं
कि ओढ़कर फिरते रहो
और न कोई आवरण
कि स्वयं को छिपाते रहो।
यह कोई पिस्तौल नहीं
कि लुक छिप कर चलाते रहो
और न अंडरग्राउंड केबिन
कि युद्ध से खुद को बचाते रहो।
यह कोई माउथपीस नहीं
कि पार्टी के नारे गुंजाते रहो
और न कोई मठ
कि उपदेश का अमृत पिलाते रहो।
कविता तो बस
ऐसे कुछ क्षण हैं-
जिनमें डूब कर
हम ख़ुद को
तरोताज़ा और
जिंदा महसूस करते हैं।
सुविख्यात कवि, संगीतकार और मनीषी प्रो. दिनकर सोनवलकर ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के अनन्तर हिंदी कविता को बगैर किसी वाद या पन्थ विशेष के अंधानुकरण के मनुष्य के अंतरबाह्य बदलाव का माध्यम बनाया था। उनकी कविताओं में समय और समाज के यथार्थ का बहुकोणीय रूपांकन मिलता है। उनकी कविताएँ यथास्थिति नहीं, परिवर्तन की पक्षधर हैं। उनकी कई लघु, किन्तु मर्मवेधी काव्य-पंक्तियाँ आज भी उनके पाठकवर्ग के मन में पैबस्त हैं। उनके साथ आत्मीय सान्निध्य का सौभाग्य मुझे मिला है, वह अमिट और अविस्मरणीय है।
वे एक समूचे कवि थे। गोष्ठियों से लेकर बड़े बड़े काव्य मंचों तक उनके काव्य-पाठ की सम्प्रेषणीयता देखते ही बनती थी, वहीं मर्ममधुर कण्ठ से दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों के सरस गायन का आस्वाद रसिकों के लिए यादगार अनुभव होता था। दिनकर सोनवलकर की स्मृति में समारोह की रूपरेखा बनाते हुए मैंने सुझाया कि उनके जीवन और व्यक्तित्व पर केंद्रित वृत्तचित्र के निर्माण के साथ उनकी कविताओं में मौजूद संगीत-नृत्य की संभावनाओं को तलाशा जाए। उनके कविमना सुपुत्र प्रतीक सोनवलकर ने तत्काल इन्हें मूर्त रूप देने का संकल्प ले लिया। इसी दिशा में नृत्य रूपक सविनय समर्पित है।
वस्तुतः कविताओं का दृश्यीकरण अनेक चुनौतियाँ देता आ रहा है। विशेष तौर पर मुक्त छन्द की रचनाओं को नृत्य- रूपक में ढालना और मुश्किल रहा है। लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि दिनकर सोनवलकर ने स्वयं कहा है, "संगीत है मेरा जीवन, साहित्य मेरा तन मन।" फिर उनकी रचनाओं में मौजूद आंतरिक लय स्वयं नृत्य -रूपक के लिए आधारभूमि दे देती है।
इस प्रस्तुति के लिए सोनवलकर जी की विविध रंगों की कविताएँ चुनी गई हैं। प्रयास रहा है कि उनका काव्यत्व बाधित न हो, वरन् अपनी नूतन अर्थवत्ता के साथ ये रचनाएँ रसिकजनों तक पहुंचे। प्रतिभा संगीत कला संस्थान द्वारा प्रस्तुत इस नृत्य रूपक में नृत्य गुरु पद्मजा रघुवंशी के निर्देशन में कथ्य और संवेदना की अनुरूपता में बहुवर्णी नृत्य संरचनाएँ की गई हैं। कहीं कथक, कहीं ओडिसी, कहीं मालवी लोक शैली तो कहीं सालसा और समकालीन पाश्चात्य नृत्य शैलियों की बुनावट से कविताओं को तराश मिली  है। संगीत-मनीषी इन्दरसिंह बैस द्वारा निर्देशित संगीत-लय नियोजन में भी इसी वैविध्य का मधुर समावेश हुआ है। ध्वन्यांकन संयोजन जगरूपसिंह चौहान और तकनीकी परामर्श भूषण जैन का है।
कुल पौन घण्टे का यह नृत्य रूपक रसिकजनों को पसन्द आएगा, ऐसा विश्वास है। काव्य और कला के एक अनन्य समाराधक के प्रति आत्मीय कृतज्ञता के साथ यह नृत्य-संगीतांजलि अर्पित है।
आत्मीय स्पर्श कविता में दिनकर सोनवलकर लिखते हैं-
बड़ों के पाँव छूने का रिवाज़
इसलिए अच्छा है
कि उनके पैरों के छाले देखकर
और बिवाइयाँ छूकर
तुम जान सको
कि ज़िन्दगी उनकी भी कठिन थी
और कैसे-कैसे संघर्षों में चलते रहे हैं वे।
बदले में
वे तुम्हें सीने से लगाते हैं
और सौंप देते हैं
अपनी समस्त आस्था, अपने अनुभव।
वह आत्मीय विद्युत- स्पर्श
भर देता है तुम्हारे भीतर
कभी समाप्त न होने वाली
एक विलक्षण ऊर्जा।
प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन








20150523

फार्मूलाबद्ध लेखन से परे युगल की लघुकथाएँ


                           प्रो॰ शैलेन्द्रकुमार शर्मा
लघुकथा समकालीन साहित्य की एक अनिवार्य और स्वायत्त विधा के रूप में स्थापित हो गई है। नई सदी में यह सामाजिक बदलाव को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। विशेष तौर पर मूल्यों के क्षरण के दौर में अनेक लघुकथाकार तीखा शर- संधान कर रहे हैं। इस क्षेत्र में सक्रिय कई रचनाकारों ने अपनी सजग क्रियाशीलता और प्रतिबद्धता से लघुकथा की अन्य विधाओं से विलक्षणता को न सिर्फ सिद्ध कर दिखाया है, वरन उससे आगे जाकर वे निरंतर नए अनुभवों के साथ नई सौंदर्यदृष्टि और नई पाठकीयता को गढ़ रहे हैं। लघुकथा विशद जीवनानुभवों  की सुगठित, सघन , किन्तु तीव्र अभिव्यक्ति है। यह कहानी का सार या संक्षिप्त रूप न होकर बुनावट और बनावट में स्वायत्त है। यह ब्योरों में जाने के बजाय संश्लेषण से ही अपनी सार्थकता पाती है।एक श्रेष्ठ लघुकथाकार इसके आण्विक कलेवर में ‘’यद्पिंडे तद्ब्रह्मांडे ‘’  के सूत्र को साकार कर सकता है। वह वामन चरणों से विराट को मापने का दुरूह कार्य अनायास कर जाता है।
वैसे तो नीति या बोधकथा और दृष्टांत के रूप में लघुकथाओं का सृजन अनेक शताब्दियों से जारी है, किन्तु इसे साहित्य की विशिष्ट विधा के रूप में प्रतिष्ठा हाल के दौर में ही मिली । नए आयामों को छूते हुए इस विधा ने सदियों की यात्रा दशकों में कर ली है। प्रारंभिक तौर पर माखनलाल चतुर्वेदी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी , माधवराव सप्रे, प्रेमचंद, प्रसाद से लेकर जैनेन्द्र, अज्ञेय जैसे कई प्रतिष्ठित रचनाकारों ने इस विधा के गठन में अपनी समर्थ भूमिका निभाई । फिर तो कई लोग जुडने लगे और यह एक स्वतंत्र विधा का गौरव प्राप्त करने में कामयाब हुई। शुरूआती दौर में इसकी कोई मुकम्मल संज्ञा तो नहीं थी, कालांतर में इस संज्ञा को व्यापक स्वीकार्यता मिल गई। यद्यपि समय – समय पर कई संज्ञाएँ भी अस्तित्व में आईं,  किन्तु वे स्थिर न रह सकीं।          
बिहार के सृजन उर्वरा भूमि के रत्न,  वरिष्ठ कथाकार युगल जी (1925) ने लघुकथा को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम देर से ही बनाया, किन्तु आज वे लघुकथा  के विधागत गठन में योगदान देने वाले प्रमुख सर्जकों में शुमार किए जाते हैं। उन्होंने अपने रचना काल के चार दशक उपन्यास, पूरी तरह कहानी, नाटक, कविता जैसी विविध विधाओं के सृजन को दिए। फिर 1985-86 के आसपास लघुकथा पर विशेष फोकस किया। तब तक विधा के नाम और आकार से जुड़ी बहस थम चुकी थी। तब से वे अन्य माध्यमों के साथ  साथ लघुकथाओं के सृजन को भी बेहद संजीदगी और निष्ठा से लेते आ रहे हैं। उन्होंने तीन उपन्यास, तीन कहानी संग्रह , तीन नाटक, दो कविता संग्रह और दो निबंध संग्रहों के साथ पाँच लघुकथा संग्रह दिए हैं।  वे महज बंद कमरों में बैठकर रचना करने वाले लेखक नहीं हैं। उन्होंने जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए जो भी देखा-भोगा है, उसे लघुकथाओं के जरिये साकार कर दिखाया है। लघुकथा के क्षेत्र में उनके द्वारा प्रणीत संचयन - उच्छवास, फूलों वाली दूब , गरम रेत , जब द्रौपदी नंगी नहीं हुई और पड़ाव के आगे पर्याप्त चर्चित और प्रशंसित रहे हैं।    
लघुकथा के क्षेत्र में फार्मूलाबद्ध लेखन बड़ी सीमा के रूप में दिखाई दे रहा है, वहीं युगल जी उसे निरंतर नया रूपाकार देते आ रहे हैं । उनकी लघुकथाओं में इस विधा को हाशिये में कैद होने से बचाने की बेचैनी साफ तौर पर देखी जा सकती है। उनकी लघुकथाओं में प्रतीयमान अर्थ की महत्ता  निरंतर बनी हुई है। भारतीय साहित्यशास्त्र में ध्वनि को काव्यात्मा के रूप प्रतिष्ठित करने के पीछे ध्वनिवादियों की गहरी दृष्टि रही है। वे जानते थे कि शब्द का वही अर्थ नहीं होता है जो सामान्य तौर पर हम देखते-समझते हैं। साहित्य में निहित ध्वनि तत्व तो घंटा अनुरणन रूप है, जिसका बाद तक प्रभाव बना रहता है। अर्थ की इस ध्वन्यात्मकता को युगल जी ने अनायास ही साध लिया है । उनकी अनेक लघुकथाएँ इस बात का साक्ष्य देती हैं।
युगल जी की निगाहें  कथित आधुनिक सभ्यता में मानव मूल्यों के क्षरण पर निरंतर बनी रही है। इसी परिवेश में कथित सभ्य समाज के अंदर बैठे आदिम मनोभावों को उनकी लघुकथा ‘’ जब द्रौपदी नंगी नहीं हुई  ‘’ पैनेपन के साथ प्रत्यक्ष करती है। मेले में खबर उड़ती है कि द्रौपदी चीरहरण खेल में द्रौपदी की भूमिका में युवा पंचमबाई उतरेंगी और दुःशासन द्वारा उसका चीरहरण यथार्थ रूप में मंचित होगा। रंगशाला में दर्शकों की भीड़ उमड़ आती है। अंततः द्रौपदी तो नग्न नहीं होती है, किन्तु वहाँ जुटे दर्शक जरूर नग्न हो जाते हैं। कभी मेलों – ठेलों में दिखाई देने वाली यह आदिम मनोवृत्ति आज के दौर में भी निरंतर बनी हुई है।
पारिवारिक सम्बन्धों का छीजना युगल जी को अंदर तक झकझोर देता है। उनकी लघुकथा ‘’ विस्थापन ‘’ घरेलू वातावरण में दिवंगतों की तसवीरों के विस्थापन के बरअक्स इंसानी रिश्तों के विस्थापन की त्रासदी को जीवंत कर देती है। एक और लघुकथा तीर्थयात्रा में माँ की यह यात्रा अंतिम यात्रा में बदल जाती है , किन्तु बेटा संवेदनशून्य बना रहता है।
युगल जी ने जनतंत्र के राजतंत्र में बदल जाने की विडम्बना को अपनी कई लघुकथाओं का विषय बनाया है। जनतंत्र शीर्षक रचना पब्लिक स्कूल में समाज अध्ययन की कक्षा में पढ़ते बच्चों के साथ शिक्षक के संवादों के जरिये हमारे सामने गहरा प्रश्न छोड़ जाती है कि क्या हम आजादी के दशकों बाद भी राजतंत्र से इंच भर दूर आ पाये हैं। चेहरे बदल गए हैं , किन्तु सत्ता का चरित्र जस का तस बना हुआ है।
बागड़ ही जब खेत को खाने लगे तो आस किससे की जाए ? इस बात को वे पैनेपन के साथ उभारते हैं। आश्रय शीर्षक लघुकथा में बलात्कृता को सुरक्षित आश्रय में रख  दिया जाता है, किन्तु वह वहाँ भी महफूज नहीं रह पाती है। अंततः  आश्रय स्थल ही उसका मृत्यु स्थल सिद्ध होता है। उनकी एक और लघुकथा ‘’ पुलिस ‘’ रक्षकों के ही भक्षक बन जाने की भयावह स्थिति का बयान है ।
उनकी ‘’ पेट का कछुआ ‘’ एक अलग अंदाज की चर्चित लघुकथा है, जहाँ लेखक की आँखों देखी घटना रचना का कलेवर लेकर आती है। बन्ने के पेट में कछुआ है। उसके इलाज के लिए पहले तो उसके पिता चंदा जुटाने के लिए तत्पर हो जाते हैं, फिर यही कार्य व्यवसाय बन जाता है। बेटे के पेट के कछुए से पिता के पेट की भूख का कछुआ जीत जाता है।
उनकी लघुकथाएँ सर्वव्यापी सांप्रदायिकता पर तीखा प्रहार करती हैं । मुर्दे शीर्षक लघुकथा में मुर्दाघर में रखे मुर्दे भी कौम की बात करते दिखाये गए हैं। वहीं पर आया एक समाजसेवी भी अपनी कौम को ध्यान में रखे हुए है, फिर किसकी बात की जाए ? एक गहरा प्रश्न युगल जी छोड़ जाते हैं। ‘’नामांतरण’’ लघुकथा में लेखक ने मानवीय सम्बन्धों के बीच धर्म के बढ़ते हस्तक्षेप को बड़ी शिद्दत से उभारा है।    अंध धार्मिकता के प्रसार के बावजूद युगल जी समाज के उन हिस्सों की ओर भी संकेत करते हैं , जहाँ अब भी संभावनाएं शेष हैं। ‘’ कर्फ्यू की वह रात ‘’ इसी प्रकार की लघुकथा है, जहाँ एक माँ धर्म या जाति के नाम पर जारी भेदों को निस्तेज कर जाती है।          
युगल जी की लघुकथाओं में निरंतर नए प्रयोग करते आ रहे हैं। उन्होंने प्रारम्भिक दौर में प्रतीक, मिथक आदि को लेकर महत्वपूर्ण कार्य किया , जो धीरे – धीरे ट्रेंड बन गया।  उनके यहाँ पूर्वांचल की स्थानीयता का चटक रंग यहाँ-वहाँ उभरता हुआ दिखाई देता है, वहीं वे सहज, किन्तु बेहद गहरे प्रतीकों की योजना से बरबस ही हमारा ध्यान खींच लेते हैं। युगल जी मानते हैं कि लघुकथा विचार, दृष्टि और प्रेरणा के सम्प्रेषण में एक तराशी हुई विधा है। यही तराश उनकी लघुकथाओं की शक्ति है और उन्हें इस सृजन धारा में विलक्षण बनाती है।

प्रो॰ शैलेन्द्रकुमार शर्मा
प्रोफ़ेसर एवं कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन [म.प्र.] 456 010



देवनागरी विमर्श

देवनागरी विमर्श: भारतीय लिपि परम्परा में देवनागरी की भूमिका अन्यतम है। सुदूर अतीत में ब्राह्मी इस देश की सार्वदेशीय लिपि थी, जिसकी उत्तरी और दक्षिणी शैली से कालांतर में भारत की विविध लिपियों का सूत्रपात हुआ। इनमें से देवनागरी को अनेक भाषाओँ की लिपि बनने का गौरव मिला। देवनागरी के उद्भव-विकास से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी के साथ हमकदमी तक समूचे पक्षों को समेटने का प्रयास है डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा द्वारा सम्पादित ग्रन्थ- देवनागरी विमर्श। चार खण्डों में विभक्त इस पुस्तक की संरचना में नागरी लिपि परिषद्, राजघाट, नई दिल्ली और कालिदास अकादेमी के सौजन्य-सहकार में मालव नागरी लिपि अनुसन्धान केंद्र की महती भूमिका रही है। अविस्मरणीय सम्पादन-सहकार संस्कृतविद् डॉ जगदीश शर्मा, साहित्यकार डॉ जगदीशचन्द्र शर्मा, डॉ संतोष पण्ड्या और डॉ मोहसिन खान का रहा। यह ग्रन्थ प्रख्यात समालोचक गुरुवर आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी को समर्पित कर हम कृतार्थ हुए थे। आवरण-आकल्पन कलाविद् अक्षय आमेरिया का है।

देवनागरी विमर्श
सम्पादक: डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा
प्रकाशक: मालव नागरी लिपि अनुसन्धान केंद्र
उज्जैन (म प्र)

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20150516

अंतर-अनुशासनिक अध्ययन-अनुसंधान के अपूर्व प्रसार का दौर

सम्पादकीय April 2015 Editorial अक्षर वार्ता अप्रैल 2015 @ Akshar varta April 2015 वर्तमान दौर ज्ञान-विज्ञान की विविधमुखी प्रगति के साथ अंतर-अनुशासनिक अध्ययन और अनुसंधान के अभूतपूर्व प्रसार का दौर है। ज्ञान की रूढ़ सीमाओं के पार कुछ नया बनाने और उन्हें विस्तार देने का महत्त्वपूर्ण नजरिया है- अंतर-अनुशासनात्मकता। अंतरानुशासनिक विशेषण का प्रयोग मुख्य तौर पर शैक्षिक हलकों में किया जाता है, जहां दो या दो से अधिक अनुशासनों के शोधकर्ताओं द्वारा अपने दृष्टिकोणों का समन्वय किया जाता है तथा सामने आई समस्या के बेहतर रूप से अनुकूलित समाधान के लिए उन दृष्टिकोणों को संशोधित किया जाता है। इसी तरह यह पद्धति वहाँ भी प्रयुक्त होती है, जब समूह शिक्षण पाठ्यक्रम के मामले में छात्रों को कई पारंपरिक अनुशासनों के संदर्भ में किसी एक विषय को समझने की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, भूमि के उपयोग के विषय को जब विभिन्न अनुशासनों, जैसे जीवविज्ञान, रसायनविज्ञान, अर्थशास्त्र, भूगोल, राजनीति विज्ञान आदि की दृष्टि से जांचा-परखा जाता है, तब वह हर बार अलग ढंग से सामने आ सकता है। अंतरानुशासनिकता दो या अधिक अकादमिक अनुशासनों का किसी एक गतिविधि, जैसे शोध परियोजना, में संयोजन है। यह विषयों की सीमाओं को अतिक्रांत कर उनसे परे सोचते हुए कुछ नया रचने का उपक्रम है। यह नई उभरती जरूरतों और व्यवसायों के अनुरूप किसी अंतरानुशासनिक क्षेत्र से सम्बद्ध एक ऐसी प्रक्रिया है, जो अकादमिक अनुशासनों या चिंतन के विभिन्न संप्रदायों की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ते हुए उसे एक संगठनात्मक इकाई में पर्यवसित करती है। अंतरानुशासनिक अनुसंधान की पद्धति ज्ञान की बुनियादी समझ को विकसित करने या समस्याओं को हल करने के लिए विशेष कारगर रहती है। अंतरानुशासनिक अनुसंधान दो या दो से अधिक अध्ययन क्षेत्रों या विशेष ज्ञान के निकायों के माध्यम से शोध की एक ऐसी पद्धति है, जहां टीमों या व्यक्तियों द्वारा विविध सूचनाओं, डेटा, तकनीक, उपकरण, दृष्टिकोणों और अवधारणाओं को एकीकृत किया जाता है। अंतर-अनुशासनात्मक अध्ययन को लेकर डबल्यू नेवेल द्वारा संपादित ‘एडवांसिंग इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज़' पुस्तक में जे. क्लेन और डबल्यू. नेवेल (1998) द्वारा दी गई इसकी परिभाषा कुछ इस तरह है, जो व्यापक रूप से उद्धृत भी की जाती है- “किसी प्रश्न का उत्तर खोजने या किसी समस्या के समाधान, अथवा किसी ऐसे विषय को लक्ष्य बनाने की प्रक्रिया अंतरानुशासनात्मक अध्ययन है, जहाँ उस प्रश्न, समस्या या विषय के अत्यधिक व्यापक या जटिल होने के कारण है, किसी एकल अनुशासन या पेशे से उसका समुचित रूप में समाधान नहीं हो पाता है। इसके माध्यम से हम अनुशासनात्मक दृष्टिकोणों को ग्रहण करते हैं और फिर अपेक्षाकृत कहीं अधिक व्यापक दृष्टिकोण की निर्मिति करते हुए गहरी अंतर्दृष्टि को समाहित करते हैं।“ (पृ. 393-4) जाहिर है यह अध्ययन पद्धति ज्ञान-विज्ञान की जटिलता और व्यापकता को अपेक्षया सुगम बनाने में विशेष तौर पर कारगर सिद्ध हो सकती है। वैसे तो अंतरानुशासनिक अनुसंधान प्राचीन युग से होते आ रहे हैं, जिनके प्रमाण पूर्व और पाश्चात्य- उभयदेशीय संदर्भों में बिखरे पड़े हैं। किन्तु आधुनिक युग में अंतर-अनुशासनात्मक शोध की विविधमुखी प्रगति दिखाई दे रही है। इसके विकास के पीछे कई कारण आधार में रहे हैं। जैसे- समाज एवं प्रकृति की जटिलता, नित-नई सामाजिक समस्याओं को सुलझाने की आवश्यकता, उन समस्याओं या प्रश्नों के उत्तर पाने की जिज्ञासा, जिसे किसी एक अनुशासन के अंतर्गत प्राप्त नहीं किया जा सकता है, नई तकनीक की सामर्थ्य और उससे प्राप्त सुविधाएं, विश्वयुद्धों के बाद सामाजिक कल्याण, आवास, जनसंख्या, अपराध आदि से जुड़े प्रश्नों और समस्याओं का हल निकालने के लिए आदि आदि। एक अन्य स्तर पर अंतरानुशासनात्मकता को अत्यधिक विशेषज्ञता के हानिकारक प्रभावों के लिए एक ठोस उपाय के रूप में भी देखा जाता रहा है। कहीं पर अंतर-अनुशासनात्मक अध्ययन किसी विषय विशेषज्ञ के बिना है और कहीं पर एकाधिक क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। निश्चय ही दोनों स्थितियों में फर्क होगा।जहां कई अंतरानुशासनिकों द्वारा कार्य किया जाता है, वहाँ जरूरी है कि विषय के विशेषज्ञगण अपने-अपने विषयों के पार देखने और नया करने की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित रखें। वे सभी ज्ञानमीमांसीय रूप से अपनी अत्यधिक विशेषज्ञता को समस्याओं के नए समाधान प्राप्त करने पर खुद को केन्द्रित करते हुए अंतःविषय सहयोग में प्रभावी भूमिका निभाएँ। तभी शोध के परिणामों को विभिन्न विषयों के ज्ञान को अद्यतन करने के लिए प्रत्यार्पित किया जा सकता है। इसीलिए अनुशासनिकों और अंतरानुशासनिकों- दोनों को एक दूसरे के पूरक संबंध में देखा जा सकता है। वर्तमान में विविध ज्ञानानुशासनों और भाषा-साहित्य के क्षेत्र में शोध की अपार संभावनाएं उद्घाटित हो रही हैं। सभी अध्ययन क्षेत्रों में अंतरानुशासनिक अनुसंधान सहित शोध की अद्यतन प्रवृत्तियों को लेकर व्यापक चेतना जाग्रत करने की जरूरत है, तभी हम शोध में गुणवत्ता उन्नयन के प्रादर्श को साकार कर पाने में समर्थ सिद्ध होंगे। इस दिशा में दृष्टि-सम्पन्न शोधकर्ताओं और युवाओं से गंभीर प्रयत्नों की अपेक्षा व्यर्थ न होगा। 'अक्षर वार्ता' परिवार शोध की नित-नूतन दिशाओं में सक्रिय मनीषियों, शोधकर्ताओं और लेखकों के शोध-आलेखों और सार्थक प्रतिक्रियाओं का सदैव स्वागत करता है। प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा- प्रधान संपादक 0 डॉ मोहन बैरागी - संपादक
अक्षर वार्ता अप्रैल 2015 @ Akshar varta April 2015 आवरण:अरालिका शर्मा cover: Aralika Sharma कला-मानविकी-समाज विज्ञान-जनसंचार-विज्ञान-वैचारिकी की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का यह अंक शोध की अधुनातन प्रवृत्तियों को लेकर सजगता की दरकार करता है....अंतरराष्ट्रीय संपादक मण्डल प्रधान सम्पादक-प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा, संपादक-डॉ मोहन बैरागी संपादक मण्डल- डॉ सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'(नॉर्वे), श्री शेरबहादुर सिंह (यूएसए), डॉ रामदेव धुरंधर (मॉरीशस), डॉ स्नेह ठाकुर (कनाडा), डॉ जय वर्मा (यू के) , प्रो टी जी प्रभाशंकर प्रेमी (बेंगलुरु) , प्रो अब्दुल अलीम (अलीगढ़) , प्रो आरसु (कालिकट) , डॉ जगदीशचंद्र शर्मा (उज्जैन), डॉ रवि शर्मा (दिल्ली) , प्रो राजश्री शर्मा (उज्जैन), डॉ सुधीर सोनी(जयपुर), डॉ गंगाप्रसाद गुणशेखर (चीन), डॉ अलका धनपत (मॉरीशस) प्रबंध संपादक- ज्योति बैरागी, सहयोगी संपादक- डॉ मोहसिन खान (महाराष्ट्र), डॉ उषा श्रीवास्तव (कर्नाटक), डॉ मधुकान्ता समाधिया(उ प्र), डॉ अनिल जूनवाल (म प्र ), डॉ प्रणु शुक्ला(राजस्थान), डॉ मनीषकुमार मिश्रा (मुंबई / वाराणसी ), डॉ पवन व्यास (उड़ीसा), डॉ गोविंद नंदाणीया (गुजरात)। कला संपादक- अक्षय आमेरिया, सह संपादक- एल एन यादव, डॉ रेखा कौशल, डॉ पराक्रम सिंह, रूपाली सारये। ईमेल aksharwartajournal@gmail.com