20161128

जीवन के शाश्वत, किन्तु अनुत्तरित प्रश्नों के बीच कैलाश वाजपेयी की कविता

कैलाश वाजपेयी  की कविता: भर्तृहरि
प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
जीवन के शाश्वत, किन्तु अनुत्तरित प्रश्नों के बीच राजयोगी भर्तृहरि से संवाद करती कैलाश वाजपेयी  की कविता को पढ़ना-सुनना विलक्षण अनुभव देता है। कैलाश वाजपेयी  (11 नवंबर 1936 - 01 अप्रैल, 2015) अछोर कविमाला के अनुपम रत्न हैं।

भर्तृहरि/कैलाश वाजपेयी

चिड़ियाँ बूढ़ी नहीं होतीं
मरखप जाती हैं जवानी में
ज़्यादा से ज़्यादा छह-सात दिन
तितली को मिलते हैं पंख
इन्हीं दिनों फूलों की चाकरी
फिर अप्रत्याशित
झपट्टा गौरेया का
एक ही कहानी है
खाने या खाए जाने की
तुम सहवास करो या आलिंगन राख का
भर्तृहरि! देही को फ़र्क नहीं पड़ता
और कोई दूसरी पृथ्वी भी नहीं है

भर्तृहरि! यों ही मत खार खाओ शरीर पर
यही यंत्र तुमको यहाँ तक लाया है
भर्तृहरि! यह लो एक अदद दर्पण
चूरचूर कर दो
प्रतिबिंबन तब भी होगा ही होगा
भर्तृहरि! अलग से बहाव नहीं कोई
असल में हम खुद ही बहाव हैं
लगातार नष्ट होते अनश्वर
अभी-अभी भूख, पल भर तृप्ति, अभी खाद
भर्तृहरि! हममें हर दिन कुछ मरता है
शेष को बचाए रखने के वास्ते
मौसम बदलता है भीतर
भर्तृहरि! तुमने मरता नहीं देखा प्यासा कोई
वह पैर लेता है, आमादा
पीने को अपना ही ख़ून
भर्तृहरि! तुमने मरुथल नहीं देखा
भर्तृहरि समय का मरुथल क्षितिजहीन है
और वहाँ पर ‘वहाँ’ जैसा कुछ भी नहीं
भर्तृहरि! भाषा की भ्रांति समझो
सूर्य नहीं, हम उदय अस्त हुआ करते हैं
युगपत् उगते मुरझते
भर्तृहरि! भाषा का पिछड़ापन समझो
जो भी हैं बंधन में पशु है
निसर्गतः फर्क नहीं कोई
राजा और गोभी में
छाया देता है वृक्ष आँख मूँदकर
सुनता है, धड़ पर, चलते आरे की
अर्रर्र, किस भाषा में रोता है पेड़
भर्तृहरि! तुमने उसकी सिसकी सुनी?

भर्तृहरि! तुम्हीं नहीं, सबको तलाश है
उस फूल की
जो भीतर की ओर खिलता है
भर्तृहरि! लगने जब लगता है
मिला अभी मिला
आ रही है सुगंध
दृश्य बदल जाता है।

(फ़ोटो भरत तिवारी Bharat Tiwari सौजन्य विकिपीडिया)
#कैलाशवाजपेयी को 18 अगस्त 2013, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में भारतीय ज्ञानपीठ के कार्यक्रम में अपनी कविता 'भर्तृहरि' का पाठ करते हुए यूट्यूब पर भी देखा जा सकता है। लिंक है...

Watch "Bhartrihari भर्तृहरि Poem by Kailash Vajpeyi" on YouTube
https://youtu.be/m6tAFRa_JGA


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