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20200520

पद्मश्री पं. रामनारायण उपाध्याय : कालमुखी तीर्थ के लोकोन्मुखी देवता -प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा | Padmashri Pt. Ramnarayan Upadhyay : People oriented Deity of Kalmukhi Tirtha - Prof. Shailendra Kumar Sharma

कालमुखी तीर्थ के लोकोन्मुखी देवता : पद्मश्री पं. रामनारायण उपाध्याय
 - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा Shailendrakumar Sharma  
 भारतीय लोक साहित्य एवं संस्कृति के अध्ययन, संचयन और अनुशीलन की  परंपरा में पद्मश्री पंडित रामनारायण उपाध्याय (जन्म 20 मई 1918) का नाम अविस्मरणीय है। वे लोक मनीषी श्री रामनरेश त्रिपाठी, पद्मभूषण पं सूर्यनारायण व्यास, डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल, विश्वनाथ काशीनाथ राजवड़े, श्रीधर व्यंकटेश केतकर, साने गुरुजी, डॉ सत्येंद्र, श्री देवेंद्र सत्यार्थी, डॉ  कृष्णदेव उपाध्याय,  डॉ श्याम परमार आदि की परंपरा के समर्थ संवाहक थे। लोक मनीषी पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय के जन्म शताब्दी वर्ष के समापन समारोह के अवसर को उनकी परम्परा के सार्थवाह श्री शिशिर उपाध्याय और परिवारजनों ने अविस्मरणीय बना दिया था। 20 मई 2018 को रामा दादा की जन्मस्थली कालमुखी, खंडवा में हुआ यादगार आयोजन आज भी चलचित्र की भाँति स्मृति पटल पर अंकित है, जिसमें देश के विभिन्न अंचलों के संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार और ग्रामवासी और परिवारजन बड़ी संख्या में जुटे थे। भाई शिशिर उपाध्याय, हेमन्त उपाध्याय और परिवारजनों ने पं उपाध्याय जी की कर्मभूमि साहित्य कुटीर के सामने एक गली के मुहाने पर खुला मंच बनाया था, जिसके तीनों ओर आबाल वृद्ध शाम ढलते ही जुटने लगे थे और देर रात तक लोक हृदय सम्राट पं उपाध्याय जी की यादों में डूबते - उतरते रहे। 

पण्डित उपाध्याय की जन्मशती की पूर्णाहुति के अवसर पर डॉ सुमन मनोहर चौरे ने रामा दादा की स्मृतियों में गोता लगाकर अनेक संस्मरण सुनाए। डॉ पूरन सहगल, प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ सुरेश कुशवाह, श्री शिशिर उपाध्याय ने दीपदीपन किया और दादा के संस्मरणों, व्यक्तित्व और कृतित्व के पृष्ठों को पलटा। अनेक लोक सर्जकों के संवाद और सम्मान का यह मौका अनूठा बन गया था। सभी लोग उस दिन दादा की कर्मस्थली कालमुखी को लोक तीर्थ के रूप में पा रहे थे, जिसका लोकोन्मुखी देवता आसमान में बिखरी चाँदनी के बीच मुस्कुरा रहा था।



दादा को लोक पर कार्य करने की प्रेरणा लोक में प्रचलित एक गणगौर गीत की दो पंक्तियों से मिली थी:
शुक्र को तारो रे ईश्वर ऊँगी रह्यो
तेकी मखsटीकी घड़ाओ।
शुक्र का तारा आसमान में चमक रहा है, उसकी मुझे बिंदी घड़वा दो।
विराट शृंगार की यह कल्पना उन्हें मुग्ध कर गई थी। फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा। उन्होंने निमाड़ लोकांचल में बिखरे ऐसे ही अनेक मणि - माणिक्य जुटाए, जो आज भारतीय लोक विरासत पर गर्व का अवसर देते हैं।

पं उपाध्याय सही मायने में पृथ्वी पुत्र थे, ‘माता भूमि पुत्रोsहं पृथिव्याः’ को साकार करने वाले। उनके लिए लोक साहित्य कामधेनु की तरह है, वहाँ जिस कामना के वशीभूत होकर जाएँ, वह सहज प्राप्त हो जाता है। उनके लिए लोक गीत मनोभावनाओं का कोमल इतिहास है। जैसे हर व्यक्ति का खास व्यक्तित्व होता है उसी तरह हर लोक गीत का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है और वह अपने लिए विशिष्ट स्थान चाहता है।

वे भाषा की अमरता के उपासक हैं। वासुदेवशरण अग्रवाल ने कहा है कि एक - एक शब्द मार्कण्डेय की आयु लिए बैठा है। उपाध्याय जी उसे साक्षात् करते हैं। शब्द कोश तो बनाते ही हैं, वर्गीकृत रूप में शब्द भंडार भी सहेजते हैं। उनकी दृष्टि में जैसे हम लोग समूह में रहते हैं, वैसे ही शब्द भी समूह में रहते हैं, अंतर्क्रिया करते हैं। इस आधार पर उन्होंने शब्दों का वर्गीकरण कर अक्षय शब्द सम्पदा को सहेजा है।
निमाड़ और निमाड़ी को केंद्र में रखते हुए उन्होंने सम्पूर्ण देश के लोक का प्रत्यक्षीकरण किया है। उनकी दृष्टि में लोक साहित्य, लोक मन की सूक्ष्म अनुभूतियों का महाकाव्य है।

लोक संस्कृति के बदलते स्वरूप को लेकर भी उन्होंने विचार किया है। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि लोक साहित्य में युग के अनुकूल अपने को ढालने और नए युग के मार्गदर्शन की क्षमता होती है। वे किसान से कहते हैं, तुम तो सजीव साहित्य के निर्माता हो। वे लोक की अजस्र शक्ति के विश्वासी थे, इसीलिए इन शक्ति स्रोतों की खोज में तल्लीन रहे, अपने लेखन के जरिये उसकी खोज का आह्वान करते रहे।

दादा ने लोक संस्कृति के अंतरप्रांतीय अध्ययन की राह खोली। रामा दादा ने पूरे देश के विभिन्न अंचलों के लोक साहित्य का अध्ययन किया एवं स्पष्ट किया कि बेटी की बिदाई का दर्द सभी लोक भाषाओं में एक सा है। उनकी विवेचनाओं में निमाड़ के साथ गुजरात, अवध, मिथिला, गढ़वाल - सब एक दूसरे से हिलेमिले दिखाई देते हैं। मालवा के साथ निमाड़ का रिश्ता बनाते हुए उन्होंने बहुत सुंदर रूपक रचा है, मालवी को यदि हम बाग - बगीचों में पली शकुंतला कहें तो निमाड़ी अरण्य वनों में से अपनी राह बनाने वाली सीता की तरह है। इसीलिए निमाड़ी में श्रम और संघर्ष प्रधान गीतों का प्राधान्य है। निमाड़ी जन की संघर्षशीलता को उन्होंने भीषण गर्मी के बीच मुस्कुराते पलाश के फूलों से तौला है। इसी चेतना को वे सब जगह देखते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ प्रहार करती एक लोक लघुकथा को वे सुनाते हैं, जिस पर जितनी टिप्पणी की जाए, कम ही होगी। 

“न्हार न बकरी सी पूछ्यो
क्यों री बकरी मांस खायगा?
बकरी न कह्यो, म्हारो ज बची जाय तो भोत छे।“


उपाध्याय की दृष्टि में, सूरज सी रेत ज्यादा तपज, या फिर तू आदमी छै की तैसिलदार, या फिर गरीब का छोरा खs सरग पर बिगार और फिर उधई का वावल्ला मs भुजंग आदि, ये सब कहावतें निमाड़ के आम जन का भोगा हुआ यथार्थ ही तो हैं। उन्हें गांधी से जुड़े निमाड़ी लोक गीतों में निमाड़ वासियों की आशा के स्वर सुनाई देते हैं : 
ई खोटी पैसों नी खरी चांदी आयs।
ई हवा अन्धौळ नी गांधी आय।।

लोक भाषा, साहित्य एवं संस्कृति पर शोध के लिए प्रचुर सामग्री उन्होंने जुटाई थी, जो नए अनुसंधान कर्ताओं के लिए आज भी उपादेय है। शब्द भंडार, लोकोक्ति - मुहावरे, पहेली संचयन, लोक गीत और कथा संग्रह, हिंदी में प्रकाशित लोक साहित्य की सूची, मेलों की सूची, निमाड़ के तीर्थ, सन्त परम्परा, सन्तों के जन्म स्थान और  समाधियों की परिचयात्मक सूची - यह सब मिलकर शोध के लिए कई नवीन दिशाओं को खोलते हैं।

उन्होंने निमाड़ का जीवन रस संचित किया है। लोक विश्वास, लोक नाट्य, नृत्य, लोक अनुष्ठान, लोकाचार, क्या नहीं सहेजा उन्होंने। सहेज कर उसके मर्म को उद्घाटित भी किया है। उनकी रचनाओं में निमाड़ भरे पूरेपन के साथ धड़कता है। पं उपाध्याय ने हिंदी जगत् को निमाड़ी लोक साहित्य, संस्कृति और इतिहास से परिचित कराने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। उनकी प्रमुख कृतियों में व्यंग्य, ललित निबन्ध, रूपक, रिपोर्ताज, लघु कथाएँ, संस्मरण आदि विधाओं में 30 से अधिक पुस्तकें शामिल हैं। हम तो बाबुल तेरे बाग की चिड़िया (लोक साहित्य), निमाड़ का सांस्कृतिक इतिहास , जब निमाड़ गाता है (लोक साहित्य), लोक साहित्य समग्र (लोक साहित्य), बक्शीशनामा, धुँधले काँच की दीवार, नाक का सवाल, मुस्कराती फाइलें, गँवईं मन और गाँव की याद, दूसरा सूरज आदि व्यंग्य संकलन हैं। जनम-जनम के फेरे (ललित निबन्ध), मृग के छौने (गद्य रूपक), जिनकी छाया भी सुखकर है तथा जिन्हें भूल न सका (संस्मरण), कथाओं की अंतर्कथा, चिट्ठी, मामूली आदमी आदि उल्लेखनीय हैं। 
रामा दादा एवं डॉ सुमन जी जैसे साहित्यकारों ने विक्रम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के वाचनालय को अपना सद्साहित्य, प्राचीन ग्रंथ और अखबार देकर समृद्ध किया था। उनके साथ अंतरंग संवाद का अवसर मुझे गुरुवर आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी के माध्यम से मिला था। जहाँ कहीं लोक का मन हास और अश्रु के साथ स्पंदित होगा, रामा दादा वही मौजूद रहेंगे।

- प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
विभागाध्यक्ष
हिंदी विभाग
कला संकायाध्यक्ष
विक्रम विश्वविद्यालय
उज्जैन मध्यप्रदेश

5 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत अतल गहराई लिए हुए

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  2. 20 मई के कार्यक्रम की यादों का कलश आज भी छलक रहा है , मैं जब मुड़कर देखता हूँ ,तो मुझे स्वयं आश्चर्य होता है , बहुत कठिन कार्य था वह , किन्तु गाँव वालों की एवम साहित्यकारों की उपस्थिति ने उसे अमर कर दिया, बिना किसी सरकारी सहायता के यह कार्यक्रम किया गया । आप और पूनम दादा की उपस्थिति ने ग्रीष्म में शीतल आख्यानो के स्त्रोत खोल दिये थे।
    नमन,,

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  3. 20 मई के कार्यक्रम की यादों का कलश आज भी छलक रहा है , मैं जब मुड़कर देखता हूँ ,तो मुझे स्वयं आश्चर्य होता है , बहुत कठिन कार्य था वह , किन्तु गाँव वालों की एवम साहित्यकारों की उपस्थिति ने उसे अमर कर दिया, बिना किसी सरकारी सहायता के यह कार्यक्रम किया गया । आप और पूनम दादा की उपस्थिति ने ग्रीष्म में शीतल आख्यानो के स्त्रोत खोल दिये थे।
    नमन,,

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  4. 20 मई के कार्यक्रम की यादों का कलश आज भी छलक रहा है , मैं जब मुड़कर देखता हूँ ,तो मुझे स्वयं आश्चर्य होता है , बहुत कठिन कार्य था वह , किन्तु गाँव वालों की एवम साहित्यकारों की उपस्थिति ने उसे अमर कर दिया, बिना किसी सरकारी सहायता के यह कार्यक्रम किया गया । आप और पूनम दादा की उपस्थिति ने ग्रीष्म में शीतल आख्यानो के स्त्रोत खोल दिये थे।
    नमन,,

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