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20200424

प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य / प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा

प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य /संपादक : प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा

पुस्तक चर्चा 

प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य : विकास और संवेदनाएँ शीर्षक भूमिका और संपादकीय के अंश :
साहित्य सृजन मानवीय सभ्यता के विकास का महत्त्वपूर्ण सोपान है। मनुष्यता का प्रादर्श सुदूर अतीत से लेकर वर्तमान युग तक के साहित्य का केंद्र रहा है। हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य देश - देशांतर में फैले भारतीय जन की संवेदनाओं, जीवन दृष्टि और विचारों का जैविक सुमेल है। इस यात्रा में नित्य नूतन जुड़ता चला आ रहा है। जो रचनाकार अपने समय और समाज के साथ मानवीय सरोकारों की जितनी गहरी समझ रखता है, वह उतना ही अपने युग में और बाद में भी प्रासंगिक होता है। हिंदी के प्राचीन एवं मध्यकालीन कवियों की रचनाएँ इस कसौटी पर तो खरी सिद्ध होती ही हैं, उससे आगे जाकर सार्वभौमिक - सार्वकालिक संवेदना और मूल्यों की प्रतिष्ठा में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
भारतीय साहित्य के विकास में हिंदी के प्राचीन एवं मध्यकालीन कवियों का अप्रतिम योगदान रहा है। इन कवियों में से अनेक ने विश्व ख्याति ही अर्जित नहीं की, आज भी देश - देशांतर में बसे भारतीय उनसे प्रेरणा पाथेय पाते हैं। इस पुस्तक में प्राचीन एवं मध्यकालीन कविता की यात्रा,  विविधविध प्रवृत्तियों, रचनाकारों के कृतित्व, प्रतिनिधि रचना - संचयन और संवेदना के विकास में उनकी भूमिका पर पर्याप्त मंथन किया गया है।
हिंदी साहित्य अपने आविर्भाव काल से लेकर अब तक अनेक सोपानों से होकर गुजरा है और व्यापक प्रेम, करुणा, भक्ति, परदु:खकातरता और वीर भावना उसे गति देते आ रहे हैं। हिंदी के प्राचीन और मध्यकालीन काव्य का परिशीलन इस दृष्टि से अनेक महत्त्वपूर्ण निष्कर्षों की ओर ले जाता है।
पुस्तक में कबीर, सूर, तुलसी, जायसी और बिहारी की चयनित रचनाओं और योगदान के समावेश के साथ ही अमीर खुसरो, विद्यापति, मीरा, केशव, भूषण, पद्माकर और घनानंद के साहित्यिक अवदान पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।
मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा 2019 ई के उत्तरार्ध में प्रकाशित इस  पुस्तक की अल्प अवधि में ही दो आवृत्तियाँ हो चुकी हैं।

- प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा Shailendrakumar Sharma

पुस्तक : प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य
प्रकाशक : मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल
प्रकाशन वर्ष 2019 ई.

प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य / संपादक : प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा - Bekhabaron ki khabar - बेखबरों की खबर - https://bkknews.page/article/praacheen-evan-madhyakaaleen-kaavy-sampaadak-pro-shailendr-kumaar-sharma/m43p3X.html



शैलेंद्रकुमार शर्मा की पुस्तक प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य Book of Shailendra Kumar Sharma 

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे।

हम बहता जल पीनेवाले
मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे,
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से,

स्‍वर्ण-शृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले,
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले।

ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने,
लाल किरण-सी चोंचखोल
चुगते तारक-अनार के दाने।

होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी।

नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो,
लेकिन पंख दिए हैं, तो
आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालो।



सुमन जी संग शैलेंद्रकुमार शर्मा 

बसंती हवा / केदारनाथ अग्रवाल

बसंती हवा

केदारनाथ अग्रवाल


हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

        सुनो बात मेरी -
        अनोखी हवा हूँ।
        बड़ी बावली हूँ,
        बड़ी मस्तमौला।
        नहीं कुछ फिकर है,
        बड़ी ही निडर हूँ।
        जिधर चाहती हूँ,
        उधर घूमती हूँ,
        मुसाफिर अजब हूँ।

न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ।
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

        जहाँ से चली मैं
        जहाँ को गई मैं -
        शहर, गाँव, बस्ती,
        नदी, रेत, निर्जन,
        हरे खेत, पोखर,
        झुलाती चली मैं।
        झुमाती चली मैं!
        हवा हूँ, हवा मै
        बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में 'कू',
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुँची -
वहाँ, गेंहुँओं में
लहर खूब मारी।

        पहर दो पहर क्या,
        अनेकों पहर तक
        इसी में रही मैं!
        खड़ी देख अलसी
        लिए शीश कलसी,
        मुझे खूब सूझी -
        हिलाया-झुलाया
        गिरी पर न कलसी!
        इसी हार को पा,
        हिलाई न सरसों,
        झुलाई न सरसों,
        हवा हूँ, हवा मैं
        बसंती हवा हूँ!

मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा -
पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी!
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!
- केदारनाथ अग्रवाल




20190703

Mero Man Lago Fakiri Mein | Mooralala Marwada | मेरो मन लागो फकीरी में | Shailendra Kumar Sharma : मुरालाल मारवाड़ा की मर्ममधुर गायकी और कच्छ के लोक संगीत के साथ कबीर की अमृतवाणी |

Mero Man Lago Fakiri Mein | Mooralala Marwada | मेरो मन लागो फकीरी में | Shailendra Kumar Sharma : मुरालाल मारवाड़ा की मर्ममधुर गायकी और कच्छ के लोक संगीत के साथ कबीर की अमृतवाणी |


मेरो मन लागो फकीरी में
जो सुख पाऊँ नाम भजन में
सो सुख नाहिं अमीरी में
मेरो मन लागो फकीरी में
भला बुरा सब का सुन लीजे
कर गुजरान गरीबी में
मेरो मन लागो फ़कीरी में
प्रेम नगर में रहनी हमारी
साहिब मिले सबूरी में
मेरो मन लागो फ़कीरी में
हाथ में कुण्डी, बगल में सोंटा
चारों दिसि जागीरी में
मेरो मन लागो फ़कीरी में
आखिर यह तन ख़ाक मिलेगा
कहाँ फिरत मग़रूरी में
मेरो मन लागो फ़कीरी में
कहत कबीर सुनो भाई साधो
साहिब मिले सबूरी में
मेरो मन लागो फ़कीर में

https://youtu.be/mgEGU4v6wb4


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